Thursday, August 25, 2016

योगेश्वर श्रीकृष्ण एवं गीता

आज से लगभग सवा पांच हजार वर्ष पूर्व द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण ने भारतवर्ष के उत्तर प्रदेश प्रान्त की मथुरा नगरी की पावन भूमि पर देवकी एवं वसुदेव के यहां आठवेँ पुत्र के रूप में अवतरित हुए थे तब भी भारतवर्ष की सामाजिक स्थिति लगभग आज जैसी ही थी। तभी तो भगवान विष्णु को अपने आठवें अवतार के रूप  में उस समय मथुरा में अवतरित होना पड़ा था। श्रीकृष्ण के जन्म के समय तात्कालिक परिस्थितियां एवम परिवेश को यदि गहराई से देखा जाये तो ज्ञात होता है कि मथुरा नरेश कंस के द्वारा किये जा रहे अत्याचार से क्षुब्ध प्रजा को उससे मुक्ति की आवश्यकता थी और इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु भगवान को अवतार लेना पड़ा था। देवकी के आठवें पुत्र के रूप  में जन्म लेने के तुरन्त बाद उन्हें कंस के भय से अर्धरात्रि में ही यमुना  नदी के उस पार गोकुल में नन्दबाबा के घर पहुंचाना पड़ा था। गोकुल पहुंचते ही श्रीकृष्ण की लीलाएं प्रारम्भ हो गयीं थीं और अपने बाल्यकाल,युवाकाल एवम जीवन के अंतिम भाग में उनके द्वारा जितनी भी लीलाएं की गयीं उन सभी में जीवन का कोई न कोई महत्वपूर्ण रहस्य एवम सन्देश छिपा हुआ था। गोकुल में उनके द्वारा बालोचित वे समस्त कार्य किये गए जो एक सामान्य बालक को करनी चाहिए थी किन्तु उनके प्रत्येक लीला व कार्य में उनकी विशिष्टता अवश्य छिपी हुई दिखाई पड़ती है। गोपिकाओं की मटकी को फोड़ना,उनके मक्खन को चुराना,नदी में स्नान करती हुई गोपिकाओं के वस्त्र चुराकर पेड़ पर छिपा देना, पूतना का वध करना,इंद्र के अहंकार को तोडना और कंस के अत्याचार को समाप्त कर उसका वध करना इन सभी का प्रयोजन उसी कार्य के  निहितार्थ में छिपा हुआ था। माता यशोदा व नन्दबाबा ने जब अपने कुलगुरु गर्गाचार्य से बालक कृष्ण का नामकरण संस्कार करवाया  था तब उसी समय उन्होंने ज्योतिष गणना के आधार पर उनका नामकरण करते हुए यह भविष्यवाणी भी कर दी थी कि यह बालक दुष्टों के दमन एवं  साधु-सन्तों के परित्राण हेतु धरती पर अवतरित हुआ है। उन्होंने नंदबाबा और यशोदा को सौभाग्यशाली भी बताया था। ज्यों ज्यों कृष्ण बड़े होने लगे उनकी लीलाओं एवम पराक्रम की चर्चा चतुर्दिक स्वतः फैलने लगी थी। इंद्र के कोप से गोकुलवासियों को बचाने हेतु सात दिनों तक वे गोवर्धन पर्वत को धारण करके वहीं पर निश्चल खड़े रहे और इंद्र द्वारा क्षमा मांगने के पश्चात ही वे गोवर्धन को यथास्थान रखे थे।
भगवान श्रीकृष्ण सोलह कलाओं में प्रवीण थे। गायन,वादन और नृत्य तीनों विधाओं में वे कुशल थे। कालियानाग के फन पर नृत्य करते हुए उन्हें देखने के लिए ब्रह्माण्ड के सारे देवता उस समय उपस्थित हो गए थे। यही कारण है कि आज भी श्रीकृष्ण भक्ति के सम्पादन में उक्त तीनों विधाओं का उपयोग भक्तों द्वारा किया जाता है क्योंकि श्रीकृष्ण जैसा कलाकार कोई दूसरा अबतक  इस पृथ्वी पर अवतरित नहीं हुआ।मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष का उन्होंने संस्पर्श किया अर्थात अपने माता-पिता के प्रति पुत्र-धर्म,मित्र के प्रति सखाधर्म,राधा एवं गोपियों के प्रति प्रेमभाव आदि को उन्होंने इतनी अधिक ऊँचाई प्रदान कर दी थी कि वह आज भी अनुकरणीय बन गयी है। राधा इनकी आह्लादिनी शक्ति थीं और राधा के बिना श्रीकृष्ण की लीला शायद इतनी जीवन्त भी न हो पाती। श्रीकृष्ण जी के सम्पूर्ण जीवन में शांति एवं क्रांति का अदभुत सहयोग देखने को मिलता है क्योंकि जहां भी आवश्यकता पड़ी वहां उन्होंने शांतिपूर्ण ढंग से उसका समाधान किया। समाज की तत्कालीन विसंगतियों की दूर करने हेतु उन्होंने एक ऐसे आदर्श की स्थापना की जिसकी आवश्यकता उन दिनों थी। द्रौपदी के चीरहरण के समय उसकी प्रार्थना सुनकर जिस प्रकार उन्होंने द्रौपदी के नारीत्व की रक्षा की वह सर्वविदित है किन्तु दुःख इस बात का है कि आज के परिवेश में किसी द्रौपदी की लाज बचाने कोई कृष्ण आगे नहीं आ रहा है। व्यक्ति को शांति एवं समाज को क्रांति चाहिए और इन दोनों का सम्यक दर्शन श्रीकृष्ण के चरित्र में दृष्टिगत होता है। इंद्र के अभिमान को तोड़ते हुए उन्होंने उनके यज्ञ को भंग कर दिया था फिर भी वे देवता विरोधी नहीं कहलाये। उन्होंने गोपालन एवं ब्राह्मणों की पूजा व सम्मान तथा मित्रता के धर्म का सम्यक निर्वाह किया था। श्रीकृष्ण ने युद्धभूमि से अर्जुन के पलायन को रोकने हेतु सफल प्रयास किया था और इस प्रयास में उन्होंने अर्जुन से जो कुछ भी कुरुक्षेत्र में कहा था वह तत्समय अर्जुन को प्रेरित करने के लिए तो था ही किन्तु बाद में सम्पूर्ण मानव जाति जो अनेकानेक विचारों,परिस्थितियों एवम सम्बन्धों में उलझा हुआ था ,के लिए भी प्रेरणास्वरूप थी। इसीलिए कहा जाता है कि कृष्ण जैसा कोई राजनीतिज्ञ नहीं और उन जैसा कोई गृहस्थ नहीं तथा उन जैसा कोई सन्यासी या योगी अबतक इस धरती पर पैदा नहीं हुआ।
श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे परमवीर थे लेकिन अपनी वीरता का उपयोग उन्होंने केवल साधु-सन्तों के परित्राण हेतु ही किया था। वे एक कुशल राजनीतिज्ञ थे किन्तु इसका प्रयोग वे जनकल्याण के लिए ही करते थे। वे परमज्ञानी योगी थे किन्तु वे ज्ञान का सदुपयोग लोगों को मानवोचित सद्व्यवहार,कर्तव्य एवं अधिकार की शिक्षा देने हेतु ही करते थे।  उनके व्यक्तित्व में प्रेम और ज्ञान का अदभुत समन्वय करने की शक्ति निहित थी। श्रीकृष्ण में दूरदर्शिता कूटकूट कर भरी थी और वे लोगों को भी दूरदर्शिता का पाठ पढ़ाते थे। उनके पास ब्रह्मास्त्र जैसा घातक हथियार सुदर्शन चक्र था किन्तु उन्होंने कभी उसका दुरूपयोग नहीं किया। इसीलिए उन्हें योगेश्वर कहा जाता है। कुरुक्षेत्र में वे सारथी थे और अश्वशाला में घोड़ों को लगे हुए बाण निकालकर उनका उपचार भी करते थे। इस प्रकार जीवन के प्रत्येक आयाम में श्रीकृष्ण परिपूर्ण दृष्टिगत होते हैं।  उन जैसा न कोई सारथी हुआ है और न कोई रथी। इसीलिए उन्हें पूर्णावतार की संज्ञा दी जाती है।
सामान्यतः भगवान कृष्ण के बालस्वरूप एवं योगेश्वर रूप की पूजा सर्वाधिक की जाती है। ज्ञान द्वारा कृष्ण सहज गम्य हैं।  महाभारत के युद्ध के दौरान उन्होने अर्जुन से कहा था :--"मैं इस शरीर से भिन्न हूँ। मैं शुद्ध आत्मा हूँ। तू भी शुद्ध आत्मा है। तेरे भाई,चाचा,गुरु,व मित्र सभी जिनसे तुम युद्ध करने वाले हो ,वे सभी शुद्ध आत्मा हैं।  युद्ध करना तुम्हारे लिए निश्चित कर्मफल है। इसीलिए तुम्हे यह कार्य आत्मा की जागृति में रहकर करना है। " श्रीकृष्ण युद्धक्षेत्र में भी समभाव प्रदर्शित करते थे। उनकी  एक ऊँगली पर सुदर्शन चक्र स्थित रहता था तो शेष अन्य उँगलिओं द्वारा वे वंशी वादन भी किया करते थे। उनके अनुसार युद्ध और प्रेम में केवल यही अन्तर है कि युद्ध विरोधी को मिटाकर जीता  जाता है और प्रेम स्वयं मिटकर। इन विविध रंगों के कारण ही उन्हें पूर्ण पुरुष कहा जाता है। 
गीता विशेष रूप से सांसारिक कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए मनुष्य को द्वंदातीत अवस्था से बाहर निकालने हेतु मनुष्य को आत्मज्ञान प्रदान करती है। गीता की उपादेयता आज इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि गीता के उपदेश जिसे वेदव्यास जी ने लगभग सात सौ श्लोकों में निबद्धकर उसे महाभारत ग्रन्थ का रूप दिया है ,यह तो भगवान विष्णु के साक्षात् अवतारी एवं प्रतिमूर्ति भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविंद से निःसृत है। द्वापर और कलियुग के सन्धिकाल में अवतरित हुए श्रीकृष्ण ने उस समय अर्जुन को निमित्त मानकर सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण एवं उन्नति हेतु एक सुलभ मार्ग प्रशस्त कर दिया था। गीता की उपादेयता के सम्बन्ध में महात्मा गाँधी जी ने कहा है :--"मैं चाहता हूँ कि गीता न केवल राष्ट्रीय शालाओं में बल्कि सभी शिक्षण संस्थाओं में पढाई जाये। जब कभी मुझे निराशा घेरती है और कहीं से प्रकाश की किरण नहीं मिलती तब मैं गीता माता की शरण में जाता हूँ। गीता का कोई न कोई श्लोक चमकता हुआ समाधान के रूप में आ जाता है और मैं मुस्कराने लगता हूँ। मेरा जीवन बाह्य कठिनाइयों व दुःखों से भरा  पड़ा है लेकिन उनका मेरे ऊपर कोई अमिट  प्रभाव नहीं पड़ सका है तो इसका श्रेय भगवद्गीता की शिक्षा को ही जाता है। " 
गीता कर्म भक्ति और ज्ञान की ऐसी त्रिवेणी है जिसमें अवगाहन से मनुष्य अपना सर्वांगीण विकास सहजरूप से कर सकता है। गीता उपनिषदों एवं वेदों का सार है। वेद अपौरुषेय,सनातन एवं अनन्त है और ब्रह्मतत्त्व व धर्मतत्व का प्रतिपादन है। अतः गीता भारतीय संस्कृति का गौरव भी है। गीता श्रीकृष्ण की वंशी की मधुर संगीत है और उनके पाञ्चजन्य शंख का दिव्य उद्घोष भी है। यह भगवान के मुखारविंद से निःसृत दिव्यवाणी है क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा था :--"मैं गीता के आश्रम में रहता हूँ ,गीता मेरा श्रेष्ठ घर है। गीता के ज्ञान का सहारा लेकर मैं तीनों लोकों का पालन करता हूँ। "     

Friday, August 12, 2016

बोधगया

बोधगया बिहार प्रान्त में स्थित बौद्ध धर्म का एक विशिष्ट केंद्र माना जाता है। महात्मा बुद्ध को बोधगया में ही एक पीपल के वृक्ष के नीचे सम्बोधि प्राप्त हुई थी तथा इसके बाद इसे बोधिवृक्ष-स्थल के रूप में जाना जाने लगा था। सम्राट अशोक के पुत्र एवम पुत्री ने इस बोधिवृक्ष की एक शाखा श्रीलंका की तत्कालीन राजधानी अनुराधपुर में लगवाई थी जो आज भी राजकीय संरक्षण में वहां पर मौजूद बताया जाता है। सम्राट अशोक ने यहां पर यात्रियों के लिए विहार तथा यात्री निवास का निर्माण करवाया था। सिद्धार्थ को इस स्थल पर बोध प्राप्त हो जाने बाद इसका महत्व बढ़ गया इसीलिए इसका नाम भी बोधगया पड़ गया।   यहां पर स्थित बोधि वृक्ष की जड़ों से निकल हुआ नवीन वृक्ष आज भी दर्शनीय है। 
भौगोलिक स्थिति :-
यह स्थल बिहार प्रान्त के गया जनपद में गया से १६ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। भारत का प्रसिद्ध पर्यटन केंद्र एवम बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र होने के नाते यह भारत के सभी प्रमुख नगरों से रेलमार्ग एवम सड़कमार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है।यहां का निकटतम हवाई अड्डा पटना है जो यहां से ११२ किलोमीटर की दूरी पर है। रेलमार्ग द्वारा निकटतम रेलवे स्टेशन गया यहां से १६ किलोमीटर दूरी पर स्थित है। सड़कमार्ग द्वारा यह रांची से २२ किलोमीटर दूर है। बिहार टूरिज्म डेवलेपमेंट का०  द्वारा बोधगया से अन्य नगरों हेतु डीलक्स बसें चलाई जाती हैं। यहां पर बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम द्वारा संचालित अतिथिगृह उपलब्ध हैं जिसमे अतिथियों के ठहरने एवम भोजन की उचित व्यवस्था की जाती है। 
ऐतिहासिक साक्ष्य :-
प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान एवम ह्वेनसांग के यात्रा विवरण से ज्ञात होता है की उनके आगमनकाल के समय यह नगर उजड़ चूका था क्योंकि जिस स्थान पर बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी वहां पर उन्होंने केवल तीन मठ ही बने हुए देखे थे। इस मठ में रहने वाले भिक्षुओं के आचार सम्बन्धी नियम अत्यधिक कठोर बताया  है। सम्राट अशोक ने सर्वप्रथम यहां पर एक मन्दिर बनवाया था जिसका वास्तविक स्थान तो ज्ञात नहीं है किन्तु यहां से प्राप्त शिलालेखों से यह जानकारी मिलती है कि बोधगया का सर्वाधिक महत्वपूर्ण मन्दिर महाबोधि मन्दिर था।इस मन्दिर के शिलालेखों में यह अंकित है कि श्रीलंका,चीन,म्यांमार ,जैसे देशों से सातवीं एवम दसवीं शताब्दी में पर्यटक यहां पर आया करते थे। चीनी यात्री फाह्यान एवम ह्वेनसांग जो क्रमशः ४०९ ई एवम ६३७ ई में बोधगया आया था के यात्रा वर्णन से इसकी पुष्टि होती है।   
महाबोधि मन्दिर :-
 सम्राट अशोक ने सर्वप्रथम यहां पर एक मन्दिर बनवाया था जिसके स्थान व चिह्न तो अब भी मौजूद हैं किन्तु मन्दिर के आकर प्रकार का कोई प्रामाणिक तथ्य अथवा उसके अवशेष दृष्टिगत नहीं हैं। बोधगया  का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्मारक महाबोधि मन्दिर है जो  वास्तुशिल्प का अनुपम एवम अद्वितीय उदाहरण है। यह मन्दिर लगभग १३०० वर्ष पूर्व बनवाया गया बताया जाता है। इस मन्दिर की ऊँचाई १७० फिट और इसके चारों कोनो पर चार शिखर बनवाये गए थे जिसके कारण इसकी बहरी भव्यता में श्रीवृद्धि होता प्रतीत होता है। इसके परिसर में अनेकों स्तूप बने हुए हैं और मन्दिर का प्रवेशद्वार बहुत ही आकर्षक एवम भव्य  लगता है। मन्दिर के गर्भगृह मेंभगवान बुद्ध की प्रतिमा स्थापित है। बोधि वृक्ष के नीचे निर्मित चबूतरे को वज्रासन की संज्ञा दी जाती है।
अन्य दर्शनीय स्थल :- 
इसके अतिरिक्त सन १९३८ ई में यहां पर तिब्बती मन्दिर का निर्माण हुआ था और सन १९४५ ई में चीनी मन्दिर एवम बौद्ध विहार का निर्माण हुआ था। वर्मा एवम थाईलैंड के बौद्ध धर्म के अनुयायियों ने भी यहां पर बौद्ध मन्दिर का निर्माण करवाया है। इसके अतिरिक्त सुजाता स्थल,दुर्गेश्वरी मन्दिर ,अनिमेषलोचन ,पुरातत्व संग्रहालय ,भूटान व लंका के बौद्ध मठ आदि भी यहां दर्शनीय स्थलों में माँने जाते है।                                                                                                            

Thursday, August 11, 2016

कौशाम्बी

कौशाम्बी भारत वर्ष का एक अतिप्राचीन ऐतिहासिक नगर है जो तत्कालीन पंचमहानगरों यथा चम्पा,राजगृह,श्रावस्ती,साकेत,कौशाम्बी तथा वाराणसी में से प्रमुख नगर माना जाता है। वस्तुतः कौशाम्बी को बौद्ध धर्म के प्रमुख केन्द्र के रूप में व्यवस्थित किया गया था क्योंकि यहां पर भिक्षु एवम भिक्षुणियों के निवासस्थल बनवाये गए थे तथा घोषिताराम,कुक्कुटाराम पावारिकाम्बन प्रसिद्ध विहार भी बनवाये गए थे। इनका निर्माण यहां के सेठ घोषित.कुक्कुट तथा पावारिक द्वारा करवाये जाने के कारण ही इनका नामकरण इन्हीं के नाम से हुआ था।  महात्मा बुद्ध के समय यह वत्स प्रदेश की राजधानी थी और उत्तर भारत के प्रमुख व्यापारिक केंद्र के रूप में इसकी ख्याति दूर दूर तक फ़ैल चुकी थी।
भौगोलिक स्थिति :-
कौशाम्बी उत्तर प्रदेश राज्य के कौशाम्बी जनपद में स्थित एक नगर है जो पूर्व में इलाहाबाद जनपद में  स्थित रह चुका है किन्तु पृथक जनपद घोषित होने के पश्चात यह कौशाम्बी में आ गया । यह नगर इलाहाबाद नगर से ६० किलोमीटर  की दूरी पर स्थित है तथा दोनों जनपदों की सीमाएं मिली हुई हैं।यह इलाहाबाद-कानपूर -दिल्ली रेलमार्ग पर स्थित है। कौशाम्बी सड़कमार्ग द्वारा भी प्रदेश के प्रमुख नगरों से जुड़ा हुआ है। यहां का निकटतम हवाई अड्डा इलाहाबाद स्थित बमरौली है जो कौशाम्बी से ५५ किलोमीटर दूर है। 
ऐतिहासिक साक्ष्य :-
जैन ग्रन्थों में कौशाम्बी का उल्लेख छठें तीर्थंकर पदमप्रभ की जन्मभूमि के रूप में प्राप्त होता है। कौशाम्बी की खुदाई में उनकी एक कमलासीन प्रतिमा प्राप्त हुई थी जो पदमप्रभ के जैन मन्दिर के सन्निकट मिली थी। कौशाम्बी के निकट भपोसा नामक स्थान से प्राप्त अभिलेखों से यह विदित होता है कि ईसा से पूर्व यहां जैन धर्म का प्रचार -प्रसार हो चुका था। महात्मा बुद्ध ने अपने ज्ञान प्राप्ति के छठवें एवम नवें वर्ष में यहां का भ्रमण किया था। उस समय महाराजा उदयन  यहां के प्रसिद्ध राजा थे। यहां के उत्खनन से प्राप्त सभी सामग्री इलाहाबाद विश्व विद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के संरक्षण में वहीं पर सुरक्षित रखवा दी गयीं है। कौशाम्बी के शासक सतानिक और महारानी मृगावती भगवान महावीर के परमभक्त थे। सतानिक के पुत्र उदयन भी जैन धर्म  समर्थक था। जैन धर्म जब कौशाम्बी में अपने उत्कर्ष पर था तब भी यह भारत का प्रमुख व्यापारिक केंद्र माना जाता रहा है। महात्मा बुद्ध के समय में भी कौशाम्बी की यही स्थिति देखने को मिलती है।         

श्रावस्ती

महात्मा बुद्ध के समय में उत्तर भारत के ६ प्रमुख महानगरों में चम्पा,राजगृह,श्रावस्ती,साकेत,कौशाम्बी तथा वाराणसी में श्रावस्ती का नाम सम्मिलित किया गया था। हिन्दू धर्म में भी श्रावस्ती का उल्लेख कई स्थानों पर  है। कौशल देश की राजधानी होने के कारण यह राजपरिवार के सदस्यों एवम अन्य कर्मचारियों के निवास स्थान के रूप में भी जाना जाता है। कहा जाता है कि भगवान बुद्ध ने अपने जीवन के अन्तिम पच्चीस वर्ष यहीं पर व्यतीत किये थे और यह बौद्ध धर्म के प्रचार- प्रसार का प्रमुख केंद्र भी था।यहाँ पर महात्मा बुद्ध ने कई चमत्कार भी किये थे।  प्राचीन ग्रंथों में श्रावस्ती के लिए सावत्थी ,चन्द्रपुरी तथा चंद्रिकापुरी के नाम से भी सम्बोधन किये जाने का उल्लेख मिलता है। इसकी पहचान सहेत -महेत नामक स्थान से भी जाती थी। 
भौगोलिक स्थिति :-
श्रावस्ती उत्तर प्रदेश  राज्य के मध्य भाग में स्थित एक जनपद एवम नगर के रूप में जाना जाता है। यह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से १३४ किलोमीटर की दूरी पर तथा बहराइच से मात्र ४७ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। बलरामपुर शहर से इसकी दूरी १२ किलोमीटर है। यह बौद्ध स्थल रेलमार्ग व सड़कमार्ग से प्रदेश एवम देश के अन्य प्रमुख नगरों से सीधे जुड़ा हुआ है। उस समय श्रावस्ती के दक्षिण में जेतवन एवम पुव्वाराम दो बौद्धमत के प्रभावशाली केंद्र स्थित थे। 
ऐतिहासिक साक्ष्य ;- 
प्राचीन ग्रंथों में श्रावस्ती के लिए सावत्थी व चन्द्रपुरी आदि उपनाम प्रयुक्त हुए हैं। बौद्ध साहित्य में भी इस नगर की समृद्धि एवम वैभव का उल्लेख मिलता है। यहां के निवासी बौद्धधर्म के अनुयायी थे। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार सवत्थ नामक ऋषि के नाम पर इसे सावत्थी कहा जाने लगा था। पांचवी शती तक इसका पतन प्रारम्भ हो चूका था जैसाकि प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान ने अपने यात्रा संस्मरण में लिखा है। पूर्वाराम,जेतवन विहार के भग्नावशेषों के दृष्टिगत फाह्यान ने भी कुछ इसी प्रकार का वर्णन किया है। सातवीं शती में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी इस नगर के उस समय नष्ट हो जाने का संकेत दिया है। 
दर्शनीय स्थल :-
श्रावस्ती में तत्समय तीन प्रमुख विहारों का निर्माण करवाया गया था जिन्हें जेतवन,पूर्वाराम एवम मल्लिकाराम  के नाम से जाना जाता है। जेतवन विहार इनमें से सर्वाधिक प्रसिद्ध है। राजकुमार जेत ने यहां पर एक उद्यान विकसित किया था इसीलिए इसे जेतवन के नाम से जाना जाने लगा था। श्रावस्ती के प्रसिद्ध सेठ अनाथभिन्दक ने इसे अठारह करोड़ स्वर्ण मुद्राओं में क्रय करके इसे बौद्ध संघ को दान में दे दिया था तथा यहां पर बाद में उसने एक विहार का निर्माण करवा दिया था। यह स्थान महात्मा बुद्ध का प्रिय स्थान था।  अतः जब कभी भी वे श्रावस्ती आते थे तो इसी जेतवन विहार में ही निवास करते थे। श्रेष्ठी मिगार की पुत्रवधू विशाखा ने पूर्वाराम नामक विहार का निर्माण करवाया था जो उस समय दो मंजिल था और उसमें कुल ५०६ कमरे बनवाये गए थे। मल्लिकाराम विहार का निर्माण मल्लिका नामक सम्राज्ञी ने करवाया था। चूँकि बौद्ध धर्म का सर्वाधिक प्रचार -प्रसार श्रावस्ती एवम इसके इर्द- गिर्द हुआ था, अतः इस स्थान को विशेष प्रथमिकता दी गयी। दिव्यावदान से यह ज्ञात होता है कि यहां पर चार स्तूप  बौद्धभिक्षु सारिपुत्र,मोदमल्यायन,महाकश्यप और आनन्द की स्मृति में बनवाये गए थे। श्रावस्ती का तत्कालीन परिवेश बौद्ध धर्म से अनुप्राणित था अतः बौद्ध धर्म से सम्बन्धित विहार एवम स्तूपों का निर्माण यहां पर करवाया गया था। श्रावस्ती  उस समय जैन धर्म का भी केंद्र था क्योंकि जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर सम्भवनाथ और आठवें तीर्थंकर चन्द्रप्रभानाथ की यह जन्मस्थली रही है और भगवान महावीर ने भी यहां पर एक वर्ष व्यतीत किया था।यहां पर बौद्ध धर्मस्थल और बौद्ध मठ तथा बुद्ध का मंदिर दर्शनीय स्थल हैं.  
यहां पर यात्रियों के ठहरने के लिए लोक निर्माण विभाग के गेस्ट हाउस ,वर्मीज टेम्पल रेस्ट हाउस एवम जैन धर्मशाला  उपलब्ध है।     

वैशाली

वैशाली बुद्धकाल में लिच्छवियों का प्रसिद्ध गणराज्य एवम उनकी राजधानी थी। यहां पर लिच्छवियों ने महात्मा बुद्ध के ठहरने के लिए महावन में कूटागारशाला का निर्माण करवाया था। इस कुटागारशाला में महात्मा बुद्ध भिक्षुओं को उपदेश दिया करते थे। इस नगर की प्रसिद्ध वधू आम्रपाली भगवान बुद्ध से दीक्षा ग्रहण कर उनका शिष्यत्व ग्रहण किया था और उसने भिक्षु संघ के लिए आम्रवाटिका को दान में उन्हें दे दिया था। वैशाली भगवान महावीर की जन्मस्थली के रूप में भी जानी जाती है।
भौगोलिक स्थिति :-
यह भारतवर्ष के बिहार प्रान्त में वैशाली जनपद के अन्तर्गत एक गांव में स्थित है। यह गांव १२ अक्टूबर १९७२ ई को मुजफ्फरपुर से अलग होकर वैशाली जनपद में सम्मिलित हुआ था जिसका मुख्यालय हाजीपुर है। भगवान बुद्ध के समय में सोलह महाजनपदों में वैशाली का स्थान मगध के समतुल्य था। तत्कालीन वैशाली का विस्तार ऊतरप्रदेश के देवरिया एवम कुशीनगर से लेकर बिहार के गाजीपुर तक था। भौगोलिक दृष्टि से यह मैदानी क्षेत्र है और इस क्षेत्र में अनेकों नदियां भी प्रवाहित होती हैं। 
ऐतिहासिक साक्ष्य :-
ऐतिहासिक दृष्टि से वैशाली को विश्व में सबसे बड़ा गणतन्त्र होने का गौरव प्राप्त है। वैशाली का नामकरण महाभारत काल के  इक्ष्वाकु वंश के राजा विशाल के नाम पर किया गया बताया जाता है। विष्णुपुराण में भी इसका उल्लेख मिलता है। यहां के राजा सुमति अयोध्या के महाराजा दशरथ के समकालीन थे। ईशा पूर्व सातवीं शताब्दी  शासक जनता के द्वारा चुना जाता था। इसीलिए इसे विश्व का प्रथम गणराज्य की संज्ञा दी जाती है। अन्य दर्शनीय स्थल :-
वैशाली बिहार का एक प्राचीन सम्पन्न नगर था जिसके खण्डहर आज भी गण्डक नदी के बाँये किनारे पर देखे जा सकते हैं। भगवान बुद्ध अपने बुद्धत्व प्राप्ति के पश्चात यहीं पर धर्मोपदेश के लिए प्रथम बार पधारे थे। प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान ने अपने यात्रा- विवरण में इंगित किया है कि इस नगर के उत्तर में एक बहुत बड़ा जंगल था और इसी जंगल में दो मंजिला एक विहार स्थित था। इस विहार में बुद्ध प्रायः रुकते थे। वैशाली के निकट उसने तीन अन्य स्तूपों के स्थित होने का भी वर्णन किया है। एक स्तूप वहां पर स्थित है जहां बुद्ध ने अंतिम बार यात्रा की थी और दूसरा इस नगर के उत्तरी पश्चिमी भाग में और तीसरा जहां बुद्ध ने संघ के संचालन हेतु अनुशासन एवम तत्सम्बन्धी नियमों का विनिश्चय किया था। ह्वेनसांग ने अपने यात्रा- वर्णन में लिखा है कि यह नगर तब उजड़ चूका था किन्तु उसने एक ऐसे स्तूप का वर्णन किया था जिसमें आनन्द भिक्षु की अस्थियां गाड़ी गयीं थीं। यहां सारिपुत्र के संरक्षण में भी एक एक स्तूप बनवाये जाने का उल्लेख हुआ है। सम्राट अशोक के शासनकाल में यहां एक सरोवर के निर्माण कराये जाने का उल्लेख भी मिलता है। इसी सरोवर के निकट ५० फिट ऊंचा एक स्तम्भ भी निर्मित था। ह्वेनसांग ने वैशाली की  द्वितीय संगीत सम्मेलन का वर्णन भी किया है। वैशाली की नगरवधू आम्रपाली आचार्य चतुरसेन द्वारा रचित ग्रन्थ है जिसपर फिल्म भी बनायी जा चुकी है। 
बौद्ध तथा जैन धर्म के अनुयायिओं के अतिरिक्त यहां पर सामान्य पर्यटक भी आते रहते हैं क्योंकि यह प्राचीनकाल से ही कला, साहित्य एवम संगीत की दृष्टि से भी अत्यन्त समृद्ध रही है। महात्मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात वैशाली में दुसरे बौद्ध परिषद् का आयोजन किया गया था और इस आयोजन की स्मृति में दो बौद्ध स्तूप बनवाये गए थे। वैशाली के सन्निकट ही एक विशाल बौद्ध मठ स्थित है जिसमें महात्मा बुद्ध उपदेश दिया करते थे।  वैशाली नगर अत्यन्त समृद्ध एवम सुरक्षित नगर था क्योंकि इसकी चाहरदीवारी में समनान्तर तीन दीवारें बनवाई गयीं थीं। बताया जाता है कि यह नगर तब १४ मील में फैला हुआ था।         

साँची

साँची महात्मा बुद्ध के जीवन एवम उनके द्वारा दिए गए उपदेशों से सम्बन्धित अनेकों स्मारकों,स्तूपों,स्तम्भों,चैत्यों से परिपूर्ण बौद्धधर्म का प्रमुख तीर्थस्थल है। तथागत बुद्ध की पुण्यस्मृति में इन सभी प्रतीक चिह्नों को समेटे हुए यह पवन स्थल भारत ही नहीं बल्कि विदेशों के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र माना जाता है।
भौगोलिक स्थिति :-
भारतवर्ष के मध्यप्रदेश प्रान्त के रायसेन जिले में विदिशा नगर के निकट स्थित पहाड़ियों पर यह बौद्धस्थल स्थित है। यह भोपाल से ४६ किलोमीटर उत्तरपूर्व तथा विदिशा से १० किलोमीटर की दूरी पर मध्यप्रदेश के मध्यभाग में स्थित है। साँची धर्मस्थल जिस पहाड़ी पर स्थित है, उस पर्वत श्रृंखला को विदिशागिरि ,चैत्यगिरि अथवा काकन्य पर्वत भी कहा जाता है। यह पर्वत श्रृंखला ९० मीटर ऊंची है तथा पर्वतीय सौन्दर्य से भरपूर होने के कारण अत्यन्त मनमोहक है। यहां पर तीसरी शताब्दी ई ० पू ० से बारहवीं शताब्दी के मध्य तक निर्मित अनेकों बौद्ध स्तूपों व स्मारकों के खण्डहर मौजूद हैं। यहां तक वायुमार्ग से पहुँचने हेतु भोपाल इसका निकटतम हवाईअड्डा है जहां से दिल्ली,ग्वालियर व इन्दौर के लिए सीधी सेवाएं उपलब्ध हैं। रेलमार्ग द्वारा जाने पर विदिशा स्टेशन जो झाँसी -इटारसी रेलमार्ग के मध्य में स्थित है ,पर उतरना पड़ता है।भेलसा यहां से ६ मील दूर है।  साँची स्टेशन से स्तूपों को देखने हेतु दो किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। यहां पर ठहरने हेतु कई अतिथिगृह,होटल  आदि उपलब्ध हैं। 
ऐतिहासिक साक्ष्य :-
साँची में स्थित बौद्ध स्मारकों,स्तूपों व चैत्यों का निर्माण सम्राट अशोक के शासनकाल में किया गया बताया जाता है। यह तीसरी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में बनवाया गया था।  इसके केंद्र में एक अर्धगोलाकार ईंट से निर्मित ढाँचा देखने को मिलता है जिसमें भगवान बुद्ध के अवशेष रखे गए हैं। यहां पर स्थित स्तूपों के सम्बन्ध में बताया जाता है कि पुष्यमित्र ने इन स्तूपों को नष्ट कर दिया था जबकि अग्निमित्र ने इसका नवनिर्माण करवाया था। शुंगवंश के अंतिम वर्षों में इन स्तूपों के ढांचे में विस्तार करवाया गया था। इसके गुम्बद को चपटा करवाकर उसके ऊपर तीन छतरियों का निर्माण करवाया गया था। सातवाहनकाल में प्रमुख बौद्ध चिह्नों यथा श्रीवत्स त्रिरत्न के साथ उन्हें एक चक्र पर स्थापित किया गया था और तोरण के ऊपर विशेष नक्काशी भी करवाई गयी थी। यहां पर स्थित स्तूप पाषाण से निर्मित हैं किन्तु काष्ठ की शैली में गढ़े हुए तोरण वर्णात्मक शिल्पों से परिपूर्ण हैं। 
 अन्य दर्शनीय स्थल :-
बौद्ध-मन्दिर :-यहां स्थित बौद्ध मन्दिर का निर्माण श्रीलंका के बौद्ध अनुयायियों द्वारा सं १९५३ ई में करवाया गया था। इसके गर्भगृह में महात्मा बुद्ध की एक भव्य एवम आकर्षक प्रतिमा स्थापित की गयी है। यहीं पर बुद्ध के परमशिष्य एवम प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु सारिपुत्र महामोदाग्यालयाना की अस्थियां सुरक्षित रखी गयीं हैं। इन अस्थियों का अवलोकन वर्ष में एक बार नवम्बर माह के अन्तिम रविवार को किया जा सकता है।यहां पर स्थित अन्य मन्दिरों की आकृति एक समान है और सभी वर्गाकार क्षेत्रफल में बने हुए हैं जिनमें चार स्तम्भों पर टिकी हुई छत का निर्माण किया गया है। यहां स्थित कई प्राचीन मन्दिर अब खण्डित हो चुके हैं ,केवल उनके स्तम्भ ही शेष बचे हुए हैं।  
स्तूप :-विदिशा की पहाड़ियों पर कई स्तूपों का निर्माण करवाया गया था। सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवम विशाल स्तूप सम्राट अशोक द्वारा निर्मित कराया गया बताया जाता है। कालान्तर में इसका नवनिर्माण संघकाल में करवाकर इसपर सीढ़ियों का निर्माण भी करवा दिया गया था। यहां पर स्थित अन्य स्तूप आकर में छोटे हैं और  सिर्फ ऐतिहासिक दृष्टि सी ही उनका महत्व है।साँची से ५ मील दुरी पर सोनारी के निकट ८ बौद्धस्तूप और ७ मिल दूर स्थित भोजपुर के निकट ३७ बौद्धस्तूप स्थित हैं 
स्तम्भ :-साँची में मौर्य सम्राट अशोक द्वारा निर्मित अशोक स्तम्भ स्थित है जो उन्हीं के द्वारा निर्मित स्तूप के सन्निकट अवस्थित है। यद्यपि यह सम्प्रति खण्डित हो चुका है और इसके ऊपरी भाग जहाँ सिंह बने हुए थे ,को सन्ग्रहालय में सुरक्षित रख दिया गया है।यहां स्थित स्तूप की ऊंचाई ४२ फिट है।  
चैत्या :-चैत्या बौद्ध अनुयायियों एवम भिक्षुओं के पठन -पाठन के स्थल के रूप में बनवाये गए थे। इनके  वर्गाकार चबूतरे पर छत डालकर इन चैत्यों का निर्माण हुआ था। महास्तूप के सामने स्थित चैत्य सम्प्रति खण्डित हो चूका है और इसका केवल स्तम्भ ही शेष बचा हुआ है। इन चैत्यों में भिक्षुओं को उपदेश अथवा ज्ञान भी दिए जाते थे। 
विहार :-विहार बौद्ध भिक्षुओं के आवास- स्थल के रूप में यहां पर बनवाये गए थे। सम्प्रति यहां स्थित विहार भी जीर्ण अवस्था में हैं। साँची में सर्वाधिक विहार का निर्माण सम्राट अशोक ने ही करवाया था। 
संग्रहालय :- साँची स्थित पहाड़ियों के निचले भाग में एक संग्रहालय बनवाया गया था जिसमें साँची के स्तूप,स्तम्भ व चैत्य आदि के खण्डित अवशेष रखे गए हैं। पर्यटकों के अवलोकन हेतु इन्हें चार गैलरियों में क्रमबद्ध रूप से रखवा दिया गया है।       

Wednesday, August 10, 2016

सारनाथ

सारनाथ वाराणसी से १० किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जो बौद्धधर्म का एक प्रसिद्ध तीर्थस्थल माना जाता है। सिटी स्टेशन से ५ किलोमीटर दुरी पर स्थित सारनाथ तक सड़कमार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है। महात्मा बुद्ध ने यहां पर अपना प्रथम उपदेश अपने पाँच प्रमुख शिष्यों को यहीं पर दिया था।यहीं से उन्होंने अपना धर्मचक्र प्रवर्तन आरम्भ किया था।  यहां पर उन्होंने लोकजीवन के लिए आष्टांगिक मार्ग जिनसे निर्वाण की सहज प्राप्ति सम्भव हो जाती है यहीं पर अपने उपदेश द्वारा उद्घाटित किया था। बौद्ध साहित्य में इस स्थान को इसिपट्टन अर्थात  ऋषिपत्तन या  मृगदाव कहा गया है। काशी के प्रसिद्ध श्रेष्ठी नन्दी ने यहां पर महात्मा बुद्ध के लिए एक विहार का निर्माण करवाया था। मौर्य सम्राट अशोक अपने धर्माचार्य उपगुप्त के साथ यहां की यात्रा की थी तथा उन्होंने यहां पर स्तूपों व स्तम्भों का निर्माण करवाया था। इन स्तूपों में धर्मराजिका स्तूप व सिंहशीर्ष स्तम्भ विशेष रूप  से प्रसिद्ध है।प्रसिद्ध बौद्धधर्मशाला यहीं पर स्थित है।  सिंहशीर्ष के चारों फलकों पर चार सिंह आपस में पीठ सटाये हुए चारों विभिन्न दिशाओं में मुख किये हुए बैठे हुए दर्शाये गए हैं। पहले उनके मस्तक पर एक धर्मचक्र बना हुआ था जो अब खण्डित हो चुका है। सम्प्रति  इसे ही भारत का राष्ट्रीय - चिह्न स्वीकार कर लिया गया है।
शुंगकाल में सारनाथ में एक वैदिक का निर्माण कराया गया था जिसके कुछ अवशेष सारनाथ संग्रहालय में अभी भी मौजूद हैं। कुषाणकाल में बुद्ध तथा बोधिसत्व की यहां पर अनेकों प्रतिमायें बनवायी गयीं थीं तथा यहां पर स्थित विहारों व स्तूपों का नवनिर्माण भी समय समय पर करवाया जाता रहा हैं। गुप्त एवम हर्षकाल इसका स्वर्णिम कल कहा जा सकता है क्योंकि उस कल में प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान ने यहां पर चार बड़े स्तूप और पाँच विहार देखे थे जबकि ह्वेनसांग के अनुसार तीस बौद्ध विहार यहां पर उस समय थे। बारहवीं शताब्दी में गहड़वाल नरेशों के संरक्षण में इस स्थल की उपेक्षा अवश्य हुई थी। सन १७९४ ई में काशी नरेश चेतसिंह के दीवान जगतसिंह ने धर्मराजिका स्तूप की ईंटें खुदवाकर यह रहस्योद्घाटन किया था। १८३६ ई में एवम १९०१ ई में कराई गयी खुदाई से इस बौद्धस्थल के अनेकों अवशेष प्राप्त हुए थे। इनमें चौखन्डी स्तूप,धर्मराजिका स्तूप,मुख्य मन्दिर,अशोक स्तम्भ,धर्मचक्र,जिनविहार,धर्मरव स्तूप स्तम्भ का सिंह शिखर, धर्मचक्र प्रवर्तन मुद्रा में कुछ बुद्ध की प्रतिमाएं,महायान सप्रदाय का बोधिसत्व तथा तारा व बौद्ध देवी देवताओं की मूर्तियां प्रमुख हैं। 
सारनाथ में स्थित धमेश स्तूप का निर्माण सम्राट अशोक ने करवाया था। कहा जाता है कि महात्मा बुद्ध ने यहीं पर अपना उपदेश दिया था। श्रीलंका के महाबोधि संस्था द्वारा निर्मित मुलगन्धा कुटी विहार मन्दिर यहां का प्रमुख दर्शनीय स्थल है। यहां पर स्थित भगवान बुद्ध के मन्दिर में अपूर्व शान्ति व आनन्द की झलक प्राप्त होती है। इस मन्दिर में जापानी कलाकार की चित्रकारी देखने को मिलती है जिनमें बुद्ध के जीवन की विभिन्न घटनाओं को प्रदर्शित किया गया है। ऐसे चित्र मन को सहज ही आकर्षित कर लेते हैं। इसके अतिरिक्त तिब्बत मन्दिर,अशोक चिह्न आदि भी यहां पर दर्शनीय हैं। सारनाथ में भारत सरकार ने एक संग्रहालय का निर्माण करवाया है जिसमें  खुदाई से प्राप्त बौद्ध धर्म से सम्बन्धित अनेकों वस्तुओं को संरक्षित किया गया है। सारनाथ स्थित गुम्बद विहार का निर्माण श्रीलंका के एक नागरिक धर्मपाल ने करवाया था। इसके अन्दर महात्मा बुद्ध की एक भव्य मूर्ति स्थापित है तह उनके जीवन से सम्बन्धित अनेकों चित्र इसकी दीवार पर अंकित किये गए हैं। सारनाथ में एक जैन मन्दिर भी बना हुआ है जो जैन धर्म के तेइसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का जन्म काशी में होने को प्रतिबिम्बित करता है। यहां पर वर्षभर पर्यटक आते रहते हैं। बौद्ध धर्म के अनुयायिओं के लिए तो यह स्थल विशेष आकर्षण का केंद्र है और धार्मिक दृष्टि से भी इसका महत्व माना जाता है।   

लुम्बिनी एवम कपिलवस्तु

बौद्धधर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध का जन्म स्थान कपिलवस्तु स्थित लुम्बिनी जो सम्प्रति नेपाल में स्थित है ,बौद्ध धर्म का प्रमुख तीर्थस्थल में एक स्थल माना जाता है। यह स्थल ऊतरप्रदेश के सिद्धार्थनगर जनपद की सीमा के सन्निकट स्थित है। यह प्राचीनकाल में कपिलवस्तु के शाक्य राजवंश के शासकों की राजधानी रही है। लुम्बिनी को रुम्मिनदेई के नाम से भी जाना जाता है। बुद्धत्व प्राप्ति के पश्चात एकबार महात्मा बुद्ध यहां आकर "देवदहसुत्त "का उपदेश दिया था। लुम्बिनी में सम्राट अशोक के समय के प्राप्त शिलालेखों से यह ज्ञात होता है कि अशोक अपने शासनकाल के बीसवें वर्ष में लुम्बिनी आये थे तथा यहां पर दान- पुण्य करके यहां के निवासियों को करमुक्त भी कर दिया था। कपिलवस्तु की प्रामाणिक जानकारी अशोक द्वारा निर्मित स्तम्भ एवम शिलालेखों से ही ज्ञात हो पाती है जिसके अनुसार यह परिलक्षित होता है कि तत्कालीन राजमहल,स्तूप एवम मन्दिर सभी खण्डहर में परिवर्तित हो चुके हैं। सम्प्रति विशाल बौद्ध विहार ही कपिलवस्तु का एकमात्र बौद्धधर्मस्थल के रूप में दर्शनीय है। यहां स्थित विशाल स्तूप में सम्प्रति बुद्ध की अस्थियाँ रखी हुई हैं। लुम्बिनी के पूर्व में निर्मित एक स्तूप के शिलालेख से यह ज्ञात होता है कि इसी स्थल पर बुद्ध को सांसारिक बन्धन एवम मायामोह से विरक्ति की अनुभूति हुई थी। 
कहा जाता है कि बुद्धत्व प्राप्ति के पश्चात बुद्ध अपने पिता शुद्धोधन के आग्रह पर एकबार कपिलवस्तु आये थे और न्यग्रोधवन नामक स्थान पर धर्मोपदेश भी दिए थे तथा अपने पुत्र राहुल को यहीं पर बौद्धधर्म की दीक्षा प्रदान की थी। कपिलवस्तु स्थित पिपरहवा नामक स्थल पर बुद्ध का बाल्यकाल व्यतीत हुआ था। शुद्धोधन के राजमहल के अवशेष यहां पर देखे जा सकते हैं। पांचवीं शताब्दी में प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान यहां पर आया था तथा अपने यात्रा विवरण में माया देवी के स्नान -स्थल सरोवर ,कूप आदि का वर्णन किया था। चीनी यात्री ह्वेनसांग सातवीं शताब्दी में यहां की यात्रा की थी और उसने सम्राट अशोक द्वारा निर्मित स्तम्भ,सरोवर तथा अन्य स्मारकों व स्तूपों का विस्तारपूर्वक वर्णन अपने यात्रा वृतांत में किया था।सम्प्रति अशोक स्तम्भ यहां पर दर्शनीय है। नेपाल सरकार द्वारा निर्मित दो स्तूप अभी भी यहां पर विद्यमान हैं।  
वर्तमान में लुम्बिनी के दर्शनीय स्थलों में अशोक के स्तम्भ और इसी के निकट स्थित बौद्धविहार के खण्डित अवशेषों से पुनर्निर्मित दो स्तूपों के दर्शन किये जा सकते हैं। यहां पर तीर्थयात्रियों के ठहरने के लिए लुम्बिनी गेस्ट हाउस ,श्रीलंका सरकार द्वारा निर्मित १८८ विस्तरों वाला अतिथिगृह, समयपति गेस्ट हॉउस व पशुपति लाज आदि प्रमुख हैं। 
भौगोलिक स्थिति :--
नेपाल की तराई में गोरखपुर से ८२ किलोमीटर उत्तर में नौतनवा रेलवे स्टेशन से आगे नेपाल की ओर बढ़ने पर यह स्थान मिलता है। यह नौतनवा से १६ किलोमीटर दूर स्थित है। पालिग्रंथों के अनुसार यह कौशल नरेश शुद्धोधन की राजधानी थी। बुद्ध की माता मायादेवी के पिता की राजधानी देवदह के मध्य में स्थित यह एक वनक्षेत्र था। बौद्धग्रंथों में इसे लुम्बिनी कानन के नाम से जाना जाता है। 
ऐतिहासिक साक्ष्य :-
कहा जाता है कि जब गौतमबुद्ध की माता माया देवी अपना प्रसवकाल निकट आने पर अपने पिता के घर जाने का विचार किया था तो मार्ग में लुम्बिनी नामक वनक्षेत्र में वे थकान के कारण विश्राम करने लगी थी और इसी दौरान उन्हें प्रसव -पीड़ा होने लगी तो उसी स्थान के निकट स्थित एक कुँए से जल निकलवाकर स्नान करके प्रसवपीड़ा को किंचित शान्त करने का प्रयास उन्होंने किया था। स्नान के पश्चात वे थोड़ी ही दूर चल पायी थी कि उन्हें जोर से प्रसवपीड़ा होने लगी तब उन्हें उसी वनक्षेत्र में स्थित एक सालवृक्ष का सहारा लेकर बैठना पड  गया और थोड़ी देर बाद वहीं पर सिद्धार्थ को जन्म दिया था । इनके साथ में चल रहे दो नाग राजाओं ने बालक सिद्धार्थ को भी उसी कुँए में स्नान करवाया।  बौद्धधर्म के अनुयायी आज भी इस कुँए को अत्यधिक पवित्र मानते हैं और उस कुँए से जल हराधन करके उसका पान करते हैं। 

Monday, August 8, 2016

महात्मा बुद्ध

गौतमबुद्ध बौद्ध दर्शन के प्रणेता एवं बौद्धधर्म के संस्थापक थे। इनका जन्म ६२४ ई०पू० कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी नामक स्थान पर हुआ था। कहा जाता है कि जब बुद्ध अपनी माता मायादेवी के गर्भ में थे उसी समय प्रसवकाल निकट होने पर उनकी माता अपने पिता के घर जा रही थीं और मार्ग में लुम्बिनी वन में विश्राम करने के समय ही उन्हें असह्य प्रसव-पीड़ा होने लगी तब वहीँ पर उन्होंने बालक सिद्धार्थ को जन्म दिया था। इनके पिता शुद्धोधन कपिलवस्तु के शाक्य गणराज्य के राजा थे। गौतमबुद्ध का बचपन का नाम सिद्धार्थ था। सिद्धार्थ के जन्म से कुछ समय बाद ही इनकी माता मायादेवी की मृत्यु हो गई थी, अतः इनका लालन- पालन इनकी विमाता गौतमी ने किया था। इनका बचपन राजसी वैभव में व्यतीत हुआ था और इनकी शिक्षा दीक्षा भी एक राजकुमार की भांति हुई थी। गौतमबुद्ध बचपन से ही एकांत प्रिय, विचारशील एवं गम्भीर व्यक्तित्व के थे। ऐसा देखकर इनके पिता ने इनका विवाह शाक्यकुल की रूपवती कन्या यशोधरा से करवा दिया ताकि उनका मन सांसारिक जीवन में लग जाये। कुछ दिनों बाद राहुल नामक एक पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई फिर भी उनका मन विरक्त ही रहता था। यद्यपि इनके पिता ने इनकी संसारिक जीवन से उदासीनता को दृष्टिगत करते हुए इन्हें वाह्य जगत से दूर रखने का पूर्ण प्रयास किया था किन्तु वे विषयभोग से आसक्त नहीं हो पाए। एक दिन सिद्धार्थ विहार के लिए निकले थे उसी समय मार्ग में एक वृद्ध व्यक्ति को जाते हुए देखा। उसे देखकर उनके मन में अनेकों प्रश्न उठने लगे। पुनः एकदिन उन्होंने एक रोगग्रस्त व्यक्ति को देखा जो असह्य पीड़ा से कराह रहा था और उसी समय एक मृत व्यक्ति की शवयात्रा को देखकर तो उनका मन अत्यधिक विचलित हो उठा और इनसे मुक्ति का मार्ग वे खोजने लगे। कुछ दिनों बाद उन्होंने एक सन्यासी को देखा जो प्रसन्नचित्त भाव से विचरण कर रहा था तो उन्होंने मन ही मन सन्यासी के जीवन को अपने द्वारा पूर्व में देखे गए बुढ़ापा ,व्याधि, तथा मृत्यु जैसी गम्भीर समस्यायों से जूझ रहे सभी व्यक्तिओं से बेहतर समझा और उसी मार्ग का अनुसरण करने का संकल्प ले लिया। इसी चिन्तन में वे प्रायः डूबे रहते थे और एक दिन रात में जब पत्नी और पुत्र दोनों गहरी निद्रा में सो रहे थे तब वे २९ वर्ष की आयु में चुपके से राजभवन छोड़कर किसी अज्ञात स्थल की ओर चल दिए। गौतमबुद्ध के इस गृहत्याग को बौद्ध गर्न्थों में "महांनिष्क्रमण" कहा गया है। वे कंथक अश्व पर सवार होकर तीन राज्यों की सीमा को पार करके अनोमा नदी के किनारे पहुँच गए और वहीँ पर उन्होंने अपने राजसी वस्त्र व आभूषण का त्याग करके सन्यासी का जीवन स्वीकार कर लिया । इसके बाद वे भिक्षाटन करते हुए वृक्षों के नीचे निवास करने लगे। कुछ दिन अनोमा नदी के किनारे स्थित मल्लों के अनुपिया नामक गाँव में रहने के बाद वे वहां से राजगृह की ओर चल पड़े। राजगृह में उनके प्रवेश की सूचना पाकर वहां के तत्कालीन राजा बिंबसार ने उन्हें बुलवाया और उनसे वार्ता करके उन्हें साधना के इस कठिन मार्ग से अलग करना चाहा किन्तु सिद्धार्थ अपने संकल्प पर अडिग रहे। वहां से वे सम्यक ज्ञान की खोज में इधर उधर भ्रमण करते हुए वैशाली के निकट अलारकालाम नामक एक सन्यासी के यहां रहकर साधना करने लगे। कुछ दिनों तक यहां रहने के पश्चात भी जब उन्हें शांति की अनुभूति नहीं हुई तब वे रूद्रकुमारपुत्त नामक दूसरे धर्माचार्य/सन्यासी के यहां पहुँच गए। यहां से भी अपेक्षित ज्ञान व शांति न प्राप्त होने पर वे बोधगया स्थित उरुवेला नामक स्थान पर आ गए। यहां पर उनकी भेंट कौण्डिय, वप्प, भद्दिय, महनम और अश्वजित नामक पांच युवक सन्यासियों से हुई। सिद्धार्थ इन पांचों  सन्यासियों के साथ वहीँ पर कठोर तप करना प्रारम्भ कर दिए और कुछ दिनों बाद तप से उन सभी की काया क्षीण होने लगी। अन्य सह सन्यासियों के परामर्श पर उन्होंने इस कठोर तप में किंचित शिथिलता कर साधना के मार्ग को थोड़ा सरल करना चाहा किन्तु सिद्धार्थ को यह उचित नहीं लगा। अतः उन्होंने वहीँ पर महातप करना आरम्भ कर दिया। अन्न जल त्याग देने के कारण उन सभी का शरीर काला पड़ने लगा और उनका शरीर इतना क्षीण हो चला था कि एकदिन सिद्धार्थ वहीँ पर मूर्छित होकर चबूतरे पर गिर गए। कठोर तप करते हुए ६ वर्ष व्यतीत होने के बाद उनके साथ रह रहे अन्य पांच सन्यासियों का धैर्य टूटने लगा और वे सभी सिद्धार्थ से अलग होकर अठारह योजन दूर ऋषिपत्तन मृगदाय की ओर चल पड़े।
अब गौतमबुद्ध अकेले ही साधनारत रहने लगे। उसी समय उरुवेला की ही एक सुजाता नामक धनी परिवार की कन्या ने अपने तरुणी होने पर वहां स्थित एक बरगद के वृक्ष से यह प्रार्थना की थी कि यदि समान जाति के कुल में उसका विवाह होकर वह पुत्रवती हो जाएगी तो प्रतिवर्ष उनकी पूजा किया करेगी। जब उसकी यह प्रार्थना पूर्ण हो गई तब वह वैशाख पूर्णिमा के दिन विधिविधान से खीर बनाकर अपनी पूर्णा  नामक दासी के साथ उस बरगद के नीचे एक तपस्वी को बैठा हुआ देखकर उसी को वह खीर अर्पित कर दी। गौतमबुद्ध ने उस खीर को प्रेमपूर्वक खाया और अगले एक सप्ताह तक भोजन नहीं किया। एक दिन उसी बोधवृक्ष के नीचे उन्होंने यह संकल्प लिया कि चाहे मेरा शरीर रहे या ना रहे, मांस, रक्त, नाड़ियां भले ही सूख क्यों ना जाये किन्तु वे सम्यक ज्ञान अर्जित किये बिना यहां से नहीं उठेंगें। अगले दिन प्रातःकाल उन्हें उसी बोधिवृक्ष के नीचे सम्यक सम्बोधि की प्राप्ति हो गई तो उनके मुख से निम्न स्वर फूट पड़े :-
                         अनेक जाति संसारं सन्धाविस्सं अनिविस्सं।
                          गहकारकं गवेसन्तो दुक्खा जाति पुनप्पुनं।
बुद्धत्व प्राप्ति के पश्चात उन्होंने उरुवेला में उसी वृक्ष के आसपास धर्मचिन्तन एवं आनंद प्राप्ति करते हुए कुछ दिन बिताए और आठवें सप्ताह में उनके मन में यह विचार आया "मैंने बड़े गम्भीर ,उत्तम ,शान्त व विद्वानों द्वारा जानने योग्य धर्म को प्राप्त किया है। सांसारिक व्यक्ति भोग विलास में लीन हैं ,अतः मैं उनको धर्मोपदेश भी करूँ तो यह उन्हें स्वीकार्य नहीं होगा। "इसी असमंजस में पड़कर वे धर्मोपदेश करने का साहस नहीं कर पा रहे थे तभी सहम्पत्ति ब्रह्मा जी ने उनके मन की बात समझकर उनके असमंजस को दूर करने हेतु स्वयं प्रकट हुए और उनसे कहा कि भन्ते:, धर्मोपदेश करें ,सुगत धर्मोपदेश करें। संसार के प्राणी धर्माचरण न करने पर नष्ट हो जायेंगे। यह आज्ञा पाते ही बुद्ध ने अपनी आँखें खोली और प्राणियों की ओर देखकर धर्मोपदेश के लिए उद्यत हो गए।
सर्वप्रथम वे आलारकालाम को धर्मोपदेश करने हेतु उनके गांव गए तो लोगों ने बताया कि उनकी तो मृत्यु हो चुकी है।  यह सुनकर बुद्ध अपने पूर्व के साथी उन पांच भिक्षुओं को धर्मोपदेश देने के लिए आगे बढे तो उन्हें याद आया कि उन्हें तो वाराणसी के ऋषिपत्तन मृगदाय के आश्रम में ही वे छोड़ आये हैं, अतः वे वाराणसी की ओर चल पड़े। उन पंचवर्गीय भिक्षुओं ने जब दूर से आते हुए बुद्ध को देखा तब वे आपस में एक दूसरे से कहने लगे कि श्रवण, देखो गौतम आ रहा है, उसे कुछ देना नहीं है, केवल बैठने के लिए बस आसन ही दे देना है। जैसे जैसे गौतमबुद्ध उनके निकट आते गए उनके संकल्प स्वयं शिथिल होने लगे और वे दौड़कर उनके पास आकर किसी ने बुद्ध के पात्र चीवर ले लिए तो किसी ने आसन बिछा दिया तो कोई  उनके पैर धोने के लिए जल लेने दौड़ पड़ा। यह देखकर गौतमबुद्ध ने उनसे कहा कि ,भिक्षुओं तथागत को नाम लेकर मत पुकारो क्योंकि वह  अर्हत सम्यक सम्बुद्ध हो चुका है। मेरी बात सुनो ,जो अमृत मैं पाया हूँ, उसे आपको भी देना चाहता हूँ। तब बुद्ध ने अपने प्रथम उपदेश में उनसे कहा :-"भिक्षुओं को दो अन्तो का सेवन प्रव्रजितों को नहीं करना चाहिए ,पहला -कामवासना अर्थात पृथकजनों के योग्य ,अनार्य सेवित ,अनर्थों से युक्त कामवासनाओं में काम- सुख में लिप्त होना और दूसरा दुःखमय ,अनार्य, अनर्थों से युक्त ,आत्मपीड़ा में लगना। इन दोनों ही अन्तो में न जाकर तथागत ने एक मध्यमार्ग खोज निकाला है जिसे तुम आष्टांगिक मार्ग कह सकते हो ,जो निम्नवत है :-१-सम्यक दृष्टि २-सम्यक संकल्प ३-सम्यक वचन ४-सम्यक कर्म ५-सम्यक जीविका ६-सम्यक व्यायाम ७-सम्यक स्मृति ८-सम्यक समाधि
जन्म,जरा,व्याधि,मरण,अप्रिय संयोग, वियोग,यथेष्ट वस्तु की अनुपलब्धि इन सभी को दुःख बताते हुए कहा कि पांच उपादान स्कन्ध अर्थात रूप, वेदना,संज्ञा, संस्कार व विज्ञानं ही दुःख हैं। चार आर्य सत्यों के अंतर्गत उन्होंने दुःख ,दुःख समुदाय, दुःख निरोध एवं गामिनी प्रतिपदा आदि के उपदेश से उन पांचों भिक्षुओं को भी अपना शिष्य बनाने में सफलता प्राप्त कर ली। आगे बुद्ध ने फिर उनसे कहा कि इन चार आर्य सत्यों के सम्यक ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात ही मैंने यह घोषणा की है कि मुझे सम्यक सम्बोधि प्राप्त हो चुकी है। बुद्धत्व प्राप्ति के पश्चात अब मैं सांसारिक बंधन से मुक्त हो चुका हूँ। यह मेरा अंतिम जन्म है ,अब मुझे संसार में दुबारा नहीं आना है। बुद्ध ने इसे निर्वाण की संज्ञा दी। बुद्ध के उपदेश को सुनकर उन पांचों भिक्षुओं को भी सम्यक ज्ञान की प्राप्ति हो गई और उन्होंने उनसे प्रव्रज्या का अनुरोध किया तब बुद्ध ने कौण्डिय ,वप्प और भट्टिय को भिक्षु बनाकर उन्हें उपसम्पदा सौंप दी। दो अन्य भिक्षुओं को उन्होंने बाद में भिक्षु बनाया था।  यहीं से गौतमबुद्ध को तथागत की उपाधि से भिक्षुओं ने सम्बोधित करने आरम्भ कर दिया और तथागत की  विधिवत पूजा करके "अंतदीपो भव" अर्थात आत्मदीप होकर जीवन के लक्ष्यों की प्राप्ति करके सम्यक सम्बुद्ध कहलाए। 
बुद्ध के उक्त प्रथम उपदेश को धर्मचक्र- प्रवर्तन की संज्ञा दी गई। उक्त आष्टांगिक मार्ग के अनुशीलन से व्यक्ति को निर्वाण की प्राप्ति होती है ,ऐसा बुद्ध के उपदेशों में कहा गया। बुद्ध ने अपने  आष्टांगिक मार्ग में अधिक सुखपूर्ण जीवन बिताना अथवा अधिक काया क्लेश में संलग्न होना, इन दोनों का निषेध करते हुए मध्यम मार्ग पर चलने के लिए कहा। बुद्ध ने आत्मा के अस्तित्व को अस्वीकार तो किया किन्तु पुनर्जन्म व कर्म-सिद्धांत को स्वीकार किया। यज्ञीय कर्मकाण्डों एवं पशुबलि जैस कुप्रथाओं का उन्होंने प्रबल विरोध किया और मानवीय एकता व समानता पर उन्होंने विशेष बल दिया। बुद्ध ने सारनाथ में एक संघ की स्थापना की और  उनके प्रथम पांच शिष्यों के अतिरिक्त वाराणसी के अनेक वैश्यों ने संघ की सदस्यता ग्रहण की तब बुद्ध ने उन सदस्यों को विभिन्न क्षेत्रों में जाकर  बौद्धधर्म का  प्रचार -प्रसार करने का आदेश दे दिया था । 
महात्मा बुद्ध के जन्म स्थान ,ज्ञान प्राप्ति स्थल तथा कार्यक्षेत्र अर्थात जहां जहां जाकर उन्होंने उपदेश व धर्म प्रचार किये ,वे स्थल कालान्तर में बौद्धतीर्थ के रूप में प्रसिद्ध हुए। उन स्थानों पर बौद्धधर्म ,दर्शन एवं साहित्य का विकास उत्तरोत्तर होता रहा। ऐसे स्थानों उनका जन्मस्थल लुम्बिनी ,{कपिलवस्तु }ज्ञान प्राप्तिस्थल बोधगया ,सारनाथ जहां तथागत ने धर्मचक्र प्रवर्तन किया एवं कुशीनगर जहां तथागत ने निर्वाण की प्राप्ति की थी ,प्रमुख हैं।