Thursday, August 11, 2016

श्रावस्ती

महात्मा बुद्ध के समय में उत्तर भारत के ६ प्रमुख महानगरों में चम्पा,राजगृह,श्रावस्ती,साकेत,कौशाम्बी तथा वाराणसी में श्रावस्ती का नाम सम्मिलित किया गया था। हिन्दू धर्म में भी श्रावस्ती का उल्लेख कई स्थानों पर  है। कौशल देश की राजधानी होने के कारण यह राजपरिवार के सदस्यों एवम अन्य कर्मचारियों के निवास स्थान के रूप में भी जाना जाता है। कहा जाता है कि भगवान बुद्ध ने अपने जीवन के अन्तिम पच्चीस वर्ष यहीं पर व्यतीत किये थे और यह बौद्ध धर्म के प्रचार- प्रसार का प्रमुख केंद्र भी था।यहाँ पर महात्मा बुद्ध ने कई चमत्कार भी किये थे।  प्राचीन ग्रंथों में श्रावस्ती के लिए सावत्थी ,चन्द्रपुरी तथा चंद्रिकापुरी के नाम से भी सम्बोधन किये जाने का उल्लेख मिलता है। इसकी पहचान सहेत -महेत नामक स्थान से भी जाती थी। 
भौगोलिक स्थिति :-
श्रावस्ती उत्तर प्रदेश  राज्य के मध्य भाग में स्थित एक जनपद एवम नगर के रूप में जाना जाता है। यह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से १३४ किलोमीटर की दूरी पर तथा बहराइच से मात्र ४७ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। बलरामपुर शहर से इसकी दूरी १२ किलोमीटर है। यह बौद्ध स्थल रेलमार्ग व सड़कमार्ग से प्रदेश एवम देश के अन्य प्रमुख नगरों से सीधे जुड़ा हुआ है। उस समय श्रावस्ती के दक्षिण में जेतवन एवम पुव्वाराम दो बौद्धमत के प्रभावशाली केंद्र स्थित थे। 
ऐतिहासिक साक्ष्य ;- 
प्राचीन ग्रंथों में श्रावस्ती के लिए सावत्थी व चन्द्रपुरी आदि उपनाम प्रयुक्त हुए हैं। बौद्ध साहित्य में भी इस नगर की समृद्धि एवम वैभव का उल्लेख मिलता है। यहां के निवासी बौद्धधर्म के अनुयायी थे। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार सवत्थ नामक ऋषि के नाम पर इसे सावत्थी कहा जाने लगा था। पांचवी शती तक इसका पतन प्रारम्भ हो चूका था जैसाकि प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान ने अपने यात्रा संस्मरण में लिखा है। पूर्वाराम,जेतवन विहार के भग्नावशेषों के दृष्टिगत फाह्यान ने भी कुछ इसी प्रकार का वर्णन किया है। सातवीं शती में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी इस नगर के उस समय नष्ट हो जाने का संकेत दिया है। 
दर्शनीय स्थल :-
श्रावस्ती में तत्समय तीन प्रमुख विहारों का निर्माण करवाया गया था जिन्हें जेतवन,पूर्वाराम एवम मल्लिकाराम  के नाम से जाना जाता है। जेतवन विहार इनमें से सर्वाधिक प्रसिद्ध है। राजकुमार जेत ने यहां पर एक उद्यान विकसित किया था इसीलिए इसे जेतवन के नाम से जाना जाने लगा था। श्रावस्ती के प्रसिद्ध सेठ अनाथभिन्दक ने इसे अठारह करोड़ स्वर्ण मुद्राओं में क्रय करके इसे बौद्ध संघ को दान में दे दिया था तथा यहां पर बाद में उसने एक विहार का निर्माण करवा दिया था। यह स्थान महात्मा बुद्ध का प्रिय स्थान था।  अतः जब कभी भी वे श्रावस्ती आते थे तो इसी जेतवन विहार में ही निवास करते थे। श्रेष्ठी मिगार की पुत्रवधू विशाखा ने पूर्वाराम नामक विहार का निर्माण करवाया था जो उस समय दो मंजिल था और उसमें कुल ५०६ कमरे बनवाये गए थे। मल्लिकाराम विहार का निर्माण मल्लिका नामक सम्राज्ञी ने करवाया था। चूँकि बौद्ध धर्म का सर्वाधिक प्रचार -प्रसार श्रावस्ती एवम इसके इर्द- गिर्द हुआ था, अतः इस स्थान को विशेष प्रथमिकता दी गयी। दिव्यावदान से यह ज्ञात होता है कि यहां पर चार स्तूप  बौद्धभिक्षु सारिपुत्र,मोदमल्यायन,महाकश्यप और आनन्द की स्मृति में बनवाये गए थे। श्रावस्ती का तत्कालीन परिवेश बौद्ध धर्म से अनुप्राणित था अतः बौद्ध धर्म से सम्बन्धित विहार एवम स्तूपों का निर्माण यहां पर करवाया गया था। श्रावस्ती  उस समय जैन धर्म का भी केंद्र था क्योंकि जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर सम्भवनाथ और आठवें तीर्थंकर चन्द्रप्रभानाथ की यह जन्मस्थली रही है और भगवान महावीर ने भी यहां पर एक वर्ष व्यतीत किया था।यहां पर बौद्ध धर्मस्थल और बौद्ध मठ तथा बुद्ध का मंदिर दर्शनीय स्थल हैं.  
यहां पर यात्रियों के ठहरने के लिए लोक निर्माण विभाग के गेस्ट हाउस ,वर्मीज टेम्पल रेस्ट हाउस एवम जैन धर्मशाला  उपलब्ध है।     

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