Thursday, August 11, 2016

साँची

साँची महात्मा बुद्ध के जीवन एवम उनके द्वारा दिए गए उपदेशों से सम्बन्धित अनेकों स्मारकों,स्तूपों,स्तम्भों,चैत्यों से परिपूर्ण बौद्धधर्म का प्रमुख तीर्थस्थल है। तथागत बुद्ध की पुण्यस्मृति में इन सभी प्रतीक चिह्नों को समेटे हुए यह पवन स्थल भारत ही नहीं बल्कि विदेशों के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र माना जाता है।
भौगोलिक स्थिति :-
भारतवर्ष के मध्यप्रदेश प्रान्त के रायसेन जिले में विदिशा नगर के निकट स्थित पहाड़ियों पर यह बौद्धस्थल स्थित है। यह भोपाल से ४६ किलोमीटर उत्तरपूर्व तथा विदिशा से १० किलोमीटर की दूरी पर मध्यप्रदेश के मध्यभाग में स्थित है। साँची धर्मस्थल जिस पहाड़ी पर स्थित है, उस पर्वत श्रृंखला को विदिशागिरि ,चैत्यगिरि अथवा काकन्य पर्वत भी कहा जाता है। यह पर्वत श्रृंखला ९० मीटर ऊंची है तथा पर्वतीय सौन्दर्य से भरपूर होने के कारण अत्यन्त मनमोहक है। यहां पर तीसरी शताब्दी ई ० पू ० से बारहवीं शताब्दी के मध्य तक निर्मित अनेकों बौद्ध स्तूपों व स्मारकों के खण्डहर मौजूद हैं। यहां तक वायुमार्ग से पहुँचने हेतु भोपाल इसका निकटतम हवाईअड्डा है जहां से दिल्ली,ग्वालियर व इन्दौर के लिए सीधी सेवाएं उपलब्ध हैं। रेलमार्ग द्वारा जाने पर विदिशा स्टेशन जो झाँसी -इटारसी रेलमार्ग के मध्य में स्थित है ,पर उतरना पड़ता है।भेलसा यहां से ६ मील दूर है।  साँची स्टेशन से स्तूपों को देखने हेतु दो किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। यहां पर ठहरने हेतु कई अतिथिगृह,होटल  आदि उपलब्ध हैं। 
ऐतिहासिक साक्ष्य :-
साँची में स्थित बौद्ध स्मारकों,स्तूपों व चैत्यों का निर्माण सम्राट अशोक के शासनकाल में किया गया बताया जाता है। यह तीसरी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में बनवाया गया था।  इसके केंद्र में एक अर्धगोलाकार ईंट से निर्मित ढाँचा देखने को मिलता है जिसमें भगवान बुद्ध के अवशेष रखे गए हैं। यहां पर स्थित स्तूपों के सम्बन्ध में बताया जाता है कि पुष्यमित्र ने इन स्तूपों को नष्ट कर दिया था जबकि अग्निमित्र ने इसका नवनिर्माण करवाया था। शुंगवंश के अंतिम वर्षों में इन स्तूपों के ढांचे में विस्तार करवाया गया था। इसके गुम्बद को चपटा करवाकर उसके ऊपर तीन छतरियों का निर्माण करवाया गया था। सातवाहनकाल में प्रमुख बौद्ध चिह्नों यथा श्रीवत्स त्रिरत्न के साथ उन्हें एक चक्र पर स्थापित किया गया था और तोरण के ऊपर विशेष नक्काशी भी करवाई गयी थी। यहां पर स्थित स्तूप पाषाण से निर्मित हैं किन्तु काष्ठ की शैली में गढ़े हुए तोरण वर्णात्मक शिल्पों से परिपूर्ण हैं। 
 अन्य दर्शनीय स्थल :-
बौद्ध-मन्दिर :-यहां स्थित बौद्ध मन्दिर का निर्माण श्रीलंका के बौद्ध अनुयायियों द्वारा सं १९५३ ई में करवाया गया था। इसके गर्भगृह में महात्मा बुद्ध की एक भव्य एवम आकर्षक प्रतिमा स्थापित की गयी है। यहीं पर बुद्ध के परमशिष्य एवम प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु सारिपुत्र महामोदाग्यालयाना की अस्थियां सुरक्षित रखी गयीं हैं। इन अस्थियों का अवलोकन वर्ष में एक बार नवम्बर माह के अन्तिम रविवार को किया जा सकता है।यहां पर स्थित अन्य मन्दिरों की आकृति एक समान है और सभी वर्गाकार क्षेत्रफल में बने हुए हैं जिनमें चार स्तम्भों पर टिकी हुई छत का निर्माण किया गया है। यहां स्थित कई प्राचीन मन्दिर अब खण्डित हो चुके हैं ,केवल उनके स्तम्भ ही शेष बचे हुए हैं।  
स्तूप :-विदिशा की पहाड़ियों पर कई स्तूपों का निर्माण करवाया गया था। सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवम विशाल स्तूप सम्राट अशोक द्वारा निर्मित कराया गया बताया जाता है। कालान्तर में इसका नवनिर्माण संघकाल में करवाकर इसपर सीढ़ियों का निर्माण भी करवा दिया गया था। यहां पर स्थित अन्य स्तूप आकर में छोटे हैं और  सिर्फ ऐतिहासिक दृष्टि सी ही उनका महत्व है।साँची से ५ मील दुरी पर सोनारी के निकट ८ बौद्धस्तूप और ७ मिल दूर स्थित भोजपुर के निकट ३७ बौद्धस्तूप स्थित हैं 
स्तम्भ :-साँची में मौर्य सम्राट अशोक द्वारा निर्मित अशोक स्तम्भ स्थित है जो उन्हीं के द्वारा निर्मित स्तूप के सन्निकट अवस्थित है। यद्यपि यह सम्प्रति खण्डित हो चुका है और इसके ऊपरी भाग जहाँ सिंह बने हुए थे ,को सन्ग्रहालय में सुरक्षित रख दिया गया है।यहां स्थित स्तूप की ऊंचाई ४२ फिट है।  
चैत्या :-चैत्या बौद्ध अनुयायियों एवम भिक्षुओं के पठन -पाठन के स्थल के रूप में बनवाये गए थे। इनके  वर्गाकार चबूतरे पर छत डालकर इन चैत्यों का निर्माण हुआ था। महास्तूप के सामने स्थित चैत्य सम्प्रति खण्डित हो चूका है और इसका केवल स्तम्भ ही शेष बचा हुआ है। इन चैत्यों में भिक्षुओं को उपदेश अथवा ज्ञान भी दिए जाते थे। 
विहार :-विहार बौद्ध भिक्षुओं के आवास- स्थल के रूप में यहां पर बनवाये गए थे। सम्प्रति यहां स्थित विहार भी जीर्ण अवस्था में हैं। साँची में सर्वाधिक विहार का निर्माण सम्राट अशोक ने ही करवाया था। 
संग्रहालय :- साँची स्थित पहाड़ियों के निचले भाग में एक संग्रहालय बनवाया गया था जिसमें साँची के स्तूप,स्तम्भ व चैत्य आदि के खण्डित अवशेष रखे गए हैं। पर्यटकों के अवलोकन हेतु इन्हें चार गैलरियों में क्रमबद्ध रूप से रखवा दिया गया है।       

No comments:

Post a Comment