आज से लगभग सवा पांच हजार वर्ष पूर्व द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण ने भारतवर्ष के उत्तर प्रदेश प्रान्त की मथुरा नगरी की पावन भूमि पर देवकी एवं वसुदेव के यहां आठवेँ पुत्र के रूप में अवतरित हुए थे तब भी भारतवर्ष की सामाजिक स्थिति लगभग आज जैसी ही थी। तभी तो भगवान विष्णु को अपने आठवें अवतार के रूप में उस समय मथुरा में अवतरित होना पड़ा था। श्रीकृष्ण के जन्म के समय तात्कालिक परिस्थितियां एवम परिवेश को यदि गहराई से देखा जाये तो ज्ञात होता है कि मथुरा नरेश कंस के द्वारा किये जा रहे अत्याचार से क्षुब्ध प्रजा को उससे मुक्ति की आवश्यकता थी और इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु भगवान को अवतार लेना पड़ा था। देवकी के आठवें पुत्र के रूप में जन्म लेने के तुरन्त बाद उन्हें कंस के भय से अर्धरात्रि में ही यमुना नदी के उस पार गोकुल में नन्दबाबा के घर पहुंचाना पड़ा था। गोकुल पहुंचते ही श्रीकृष्ण की लीलाएं प्रारम्भ हो गयीं थीं और अपने बाल्यकाल,युवाकाल एवम जीवन के अंतिम भाग में उनके द्वारा जितनी भी लीलाएं की गयीं उन सभी में जीवन का कोई न कोई महत्वपूर्ण रहस्य एवम सन्देश छिपा हुआ था। गोकुल में उनके द्वारा बालोचित वे समस्त कार्य किये गए जो एक सामान्य बालक को करनी चाहिए थी किन्तु उनके प्रत्येक लीला व कार्य में उनकी विशिष्टता अवश्य छिपी हुई दिखाई पड़ती है। गोपिकाओं की मटकी को फोड़ना,उनके मक्खन को चुराना,नदी में स्नान करती हुई गोपिकाओं के वस्त्र चुराकर पेड़ पर छिपा देना, पूतना का वध करना,इंद्र के अहंकार को तोडना और कंस के अत्याचार को समाप्त कर उसका वध करना इन सभी का प्रयोजन उसी कार्य के निहितार्थ में छिपा हुआ था। माता यशोदा व नन्दबाबा ने जब अपने कुलगुरु गर्गाचार्य से बालक कृष्ण का नामकरण संस्कार करवाया था तब उसी समय उन्होंने ज्योतिष गणना के आधार पर उनका नामकरण करते हुए यह भविष्यवाणी भी कर दी थी कि यह बालक दुष्टों के दमन एवं साधु-सन्तों के परित्राण हेतु धरती पर अवतरित हुआ है। उन्होंने नंदबाबा और यशोदा को सौभाग्यशाली भी बताया था। ज्यों ज्यों कृष्ण बड़े होने लगे उनकी लीलाओं एवम पराक्रम की चर्चा चतुर्दिक स्वतः फैलने लगी थी। इंद्र के कोप से गोकुलवासियों को बचाने हेतु सात दिनों तक वे गोवर्धन पर्वत को धारण करके वहीं पर निश्चल खड़े रहे और इंद्र द्वारा क्षमा मांगने के पश्चात ही वे गोवर्धन को यथास्थान रखे थे।
भगवान श्रीकृष्ण सोलह कलाओं में प्रवीण थे। गायन,वादन और नृत्य तीनों विधाओं में वे कुशल थे। कालियानाग के फन पर नृत्य करते हुए उन्हें देखने के लिए ब्रह्माण्ड के सारे देवता उस समय उपस्थित हो गए थे। यही कारण है कि आज भी श्रीकृष्ण भक्ति के सम्पादन में उक्त तीनों विधाओं का उपयोग भक्तों द्वारा किया जाता है क्योंकि श्रीकृष्ण जैसा कलाकार कोई दूसरा अबतक इस पृथ्वी पर अवतरित नहीं हुआ।मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष का उन्होंने संस्पर्श किया अर्थात अपने माता-पिता के प्रति पुत्र-धर्म,मित्र के प्रति सखाधर्म,राधा एवं गोपियों के प्रति प्रेमभाव आदि को उन्होंने इतनी अधिक ऊँचाई प्रदान कर दी थी कि वह आज भी अनुकरणीय बन गयी है। राधा इनकी आह्लादिनी शक्ति थीं और राधा के बिना श्रीकृष्ण की लीला शायद इतनी जीवन्त भी न हो पाती। श्रीकृष्ण जी के सम्पूर्ण जीवन में शांति एवं क्रांति का अदभुत सहयोग देखने को मिलता है क्योंकि जहां भी आवश्यकता पड़ी वहां उन्होंने शांतिपूर्ण ढंग से उसका समाधान किया। समाज की तत्कालीन विसंगतियों की दूर करने हेतु उन्होंने एक ऐसे आदर्श की स्थापना की जिसकी आवश्यकता उन दिनों थी। द्रौपदी के चीरहरण के समय उसकी प्रार्थना सुनकर जिस प्रकार उन्होंने द्रौपदी के नारीत्व की रक्षा की वह सर्वविदित है किन्तु दुःख इस बात का है कि आज के परिवेश में किसी द्रौपदी की लाज बचाने कोई कृष्ण आगे नहीं आ रहा है। व्यक्ति को शांति एवं समाज को क्रांति चाहिए और इन दोनों का सम्यक दर्शन श्रीकृष्ण के चरित्र में दृष्टिगत होता है। इंद्र के अभिमान को तोड़ते हुए उन्होंने उनके यज्ञ को भंग कर दिया था फिर भी वे देवता विरोधी नहीं कहलाये। उन्होंने गोपालन एवं ब्राह्मणों की पूजा व सम्मान तथा मित्रता के धर्म का सम्यक निर्वाह किया था। श्रीकृष्ण ने युद्धभूमि से अर्जुन के पलायन को रोकने हेतु सफल प्रयास किया था और इस प्रयास में उन्होंने अर्जुन से जो कुछ भी कुरुक्षेत्र में कहा था वह तत्समय अर्जुन को प्रेरित करने के लिए तो था ही किन्तु बाद में सम्पूर्ण मानव जाति जो अनेकानेक विचारों,परिस्थितियों एवम सम्बन्धों में उलझा हुआ था ,के लिए भी प्रेरणास्वरूप थी। इसीलिए कहा जाता है कि कृष्ण जैसा कोई राजनीतिज्ञ नहीं और उन जैसा कोई गृहस्थ नहीं तथा उन जैसा कोई सन्यासी या योगी अबतक इस धरती पर पैदा नहीं हुआ।
श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे परमवीर थे लेकिन अपनी वीरता का उपयोग उन्होंने केवल साधु-सन्तों के परित्राण हेतु ही किया था। वे एक कुशल राजनीतिज्ञ थे किन्तु इसका प्रयोग वे जनकल्याण के लिए ही करते थे। वे परमज्ञानी योगी थे किन्तु वे ज्ञान का सदुपयोग लोगों को मानवोचित सद्व्यवहार,कर्तव्य एवं अधिकार की शिक्षा देने हेतु ही करते थे। उनके व्यक्तित्व में प्रेम और ज्ञान का अदभुत समन्वय करने की शक्ति निहित थी। श्रीकृष्ण में दूरदर्शिता कूटकूट कर भरी थी और वे लोगों को भी दूरदर्शिता का पाठ पढ़ाते थे। उनके पास ब्रह्मास्त्र जैसा घातक हथियार सुदर्शन चक्र था किन्तु उन्होंने कभी उसका दुरूपयोग नहीं किया। इसीलिए उन्हें योगेश्वर कहा जाता है। कुरुक्षेत्र में वे सारथी थे और अश्वशाला में घोड़ों को लगे हुए बाण निकालकर उनका उपचार भी करते थे। इस प्रकार जीवन के प्रत्येक आयाम में श्रीकृष्ण परिपूर्ण दृष्टिगत होते हैं। उन जैसा न कोई सारथी हुआ है और न कोई रथी। इसीलिए उन्हें पूर्णावतार की संज्ञा दी जाती है।
सामान्यतः भगवान कृष्ण के बालस्वरूप एवं योगेश्वर रूप की पूजा सर्वाधिक की जाती है। ज्ञान द्वारा कृष्ण सहज गम्य हैं। महाभारत के युद्ध के दौरान उन्होने अर्जुन से कहा था :--"मैं इस शरीर से भिन्न हूँ। मैं शुद्ध आत्मा हूँ। तू भी शुद्ध आत्मा है। तेरे भाई,चाचा,गुरु,व मित्र सभी जिनसे तुम युद्ध करने वाले हो ,वे सभी शुद्ध आत्मा हैं। युद्ध करना तुम्हारे लिए निश्चित कर्मफल है। इसीलिए तुम्हे यह कार्य आत्मा की जागृति में रहकर करना है। " श्रीकृष्ण युद्धक्षेत्र में भी समभाव प्रदर्शित करते थे। उनकी एक ऊँगली पर सुदर्शन चक्र स्थित रहता था तो शेष अन्य उँगलिओं द्वारा वे वंशी वादन भी किया करते थे। उनके अनुसार युद्ध और प्रेम में केवल यही अन्तर है कि युद्ध विरोधी को मिटाकर जीता जाता है और प्रेम स्वयं मिटकर। इन विविध रंगों के कारण ही उन्हें पूर्ण पुरुष कहा जाता है।
गीता विशेष रूप से सांसारिक कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए मनुष्य को द्वंदातीत अवस्था से बाहर निकालने हेतु मनुष्य को आत्मज्ञान प्रदान करती है। गीता की उपादेयता आज इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि गीता के उपदेश जिसे वेदव्यास जी ने लगभग सात सौ श्लोकों में निबद्धकर उसे महाभारत ग्रन्थ का रूप दिया है ,यह तो भगवान विष्णु के साक्षात् अवतारी एवं प्रतिमूर्ति भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविंद से निःसृत है। द्वापर और कलियुग के सन्धिकाल में अवतरित हुए श्रीकृष्ण ने उस समय अर्जुन को निमित्त मानकर सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण एवं उन्नति हेतु एक सुलभ मार्ग प्रशस्त कर दिया था। गीता की उपादेयता के सम्बन्ध में महात्मा गाँधी जी ने कहा है :--"मैं चाहता हूँ कि गीता न केवल राष्ट्रीय शालाओं में बल्कि सभी शिक्षण संस्थाओं में पढाई जाये। जब कभी मुझे निराशा घेरती है और कहीं से प्रकाश की किरण नहीं मिलती तब मैं गीता माता की शरण में जाता हूँ। गीता का कोई न कोई श्लोक चमकता हुआ समाधान के रूप में आ जाता है और मैं मुस्कराने लगता हूँ। मेरा जीवन बाह्य कठिनाइयों व दुःखों से भरा पड़ा है लेकिन उनका मेरे ऊपर कोई अमिट प्रभाव नहीं पड़ सका है तो इसका श्रेय भगवद्गीता की शिक्षा को ही जाता है। "
गीता कर्म भक्ति और ज्ञान की ऐसी त्रिवेणी है जिसमें अवगाहन से मनुष्य अपना सर्वांगीण विकास सहजरूप से कर सकता है। गीता उपनिषदों एवं वेदों का सार है। वेद अपौरुषेय,सनातन एवं अनन्त है और ब्रह्मतत्त्व व धर्मतत्व का प्रतिपादन है। अतः गीता भारतीय संस्कृति का गौरव भी है। गीता श्रीकृष्ण की वंशी की मधुर संगीत है और उनके पाञ्चजन्य शंख का दिव्य उद्घोष भी है। यह भगवान के मुखारविंद से निःसृत दिव्यवाणी है क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा था :--"मैं गीता के आश्रम में रहता हूँ ,गीता मेरा श्रेष्ठ घर है। गीता के ज्ञान का सहारा लेकर मैं तीनों लोकों का पालन करता हूँ। "
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