Wednesday, August 10, 2016

लुम्बिनी एवम कपिलवस्तु

बौद्धधर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध का जन्म स्थान कपिलवस्तु स्थित लुम्बिनी जो सम्प्रति नेपाल में स्थित है ,बौद्ध धर्म का प्रमुख तीर्थस्थल में एक स्थल माना जाता है। यह स्थल ऊतरप्रदेश के सिद्धार्थनगर जनपद की सीमा के सन्निकट स्थित है। यह प्राचीनकाल में कपिलवस्तु के शाक्य राजवंश के शासकों की राजधानी रही है। लुम्बिनी को रुम्मिनदेई के नाम से भी जाना जाता है। बुद्धत्व प्राप्ति के पश्चात एकबार महात्मा बुद्ध यहां आकर "देवदहसुत्त "का उपदेश दिया था। लुम्बिनी में सम्राट अशोक के समय के प्राप्त शिलालेखों से यह ज्ञात होता है कि अशोक अपने शासनकाल के बीसवें वर्ष में लुम्बिनी आये थे तथा यहां पर दान- पुण्य करके यहां के निवासियों को करमुक्त भी कर दिया था। कपिलवस्तु की प्रामाणिक जानकारी अशोक द्वारा निर्मित स्तम्भ एवम शिलालेखों से ही ज्ञात हो पाती है जिसके अनुसार यह परिलक्षित होता है कि तत्कालीन राजमहल,स्तूप एवम मन्दिर सभी खण्डहर में परिवर्तित हो चुके हैं। सम्प्रति विशाल बौद्ध विहार ही कपिलवस्तु का एकमात्र बौद्धधर्मस्थल के रूप में दर्शनीय है। यहां स्थित विशाल स्तूप में सम्प्रति बुद्ध की अस्थियाँ रखी हुई हैं। लुम्बिनी के पूर्व में निर्मित एक स्तूप के शिलालेख से यह ज्ञात होता है कि इसी स्थल पर बुद्ध को सांसारिक बन्धन एवम मायामोह से विरक्ति की अनुभूति हुई थी। 
कहा जाता है कि बुद्धत्व प्राप्ति के पश्चात बुद्ध अपने पिता शुद्धोधन के आग्रह पर एकबार कपिलवस्तु आये थे और न्यग्रोधवन नामक स्थान पर धर्मोपदेश भी दिए थे तथा अपने पुत्र राहुल को यहीं पर बौद्धधर्म की दीक्षा प्रदान की थी। कपिलवस्तु स्थित पिपरहवा नामक स्थल पर बुद्ध का बाल्यकाल व्यतीत हुआ था। शुद्धोधन के राजमहल के अवशेष यहां पर देखे जा सकते हैं। पांचवीं शताब्दी में प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान यहां पर आया था तथा अपने यात्रा विवरण में माया देवी के स्नान -स्थल सरोवर ,कूप आदि का वर्णन किया था। चीनी यात्री ह्वेनसांग सातवीं शताब्दी में यहां की यात्रा की थी और उसने सम्राट अशोक द्वारा निर्मित स्तम्भ,सरोवर तथा अन्य स्मारकों व स्तूपों का विस्तारपूर्वक वर्णन अपने यात्रा वृतांत में किया था।सम्प्रति अशोक स्तम्भ यहां पर दर्शनीय है। नेपाल सरकार द्वारा निर्मित दो स्तूप अभी भी यहां पर विद्यमान हैं।  
वर्तमान में लुम्बिनी के दर्शनीय स्थलों में अशोक के स्तम्भ और इसी के निकट स्थित बौद्धविहार के खण्डित अवशेषों से पुनर्निर्मित दो स्तूपों के दर्शन किये जा सकते हैं। यहां पर तीर्थयात्रियों के ठहरने के लिए लुम्बिनी गेस्ट हाउस ,श्रीलंका सरकार द्वारा निर्मित १८८ विस्तरों वाला अतिथिगृह, समयपति गेस्ट हॉउस व पशुपति लाज आदि प्रमुख हैं। 
भौगोलिक स्थिति :--
नेपाल की तराई में गोरखपुर से ८२ किलोमीटर उत्तर में नौतनवा रेलवे स्टेशन से आगे नेपाल की ओर बढ़ने पर यह स्थान मिलता है। यह नौतनवा से १६ किलोमीटर दूर स्थित है। पालिग्रंथों के अनुसार यह कौशल नरेश शुद्धोधन की राजधानी थी। बुद्ध की माता मायादेवी के पिता की राजधानी देवदह के मध्य में स्थित यह एक वनक्षेत्र था। बौद्धग्रंथों में इसे लुम्बिनी कानन के नाम से जाना जाता है। 
ऐतिहासिक साक्ष्य :-
कहा जाता है कि जब गौतमबुद्ध की माता माया देवी अपना प्रसवकाल निकट आने पर अपने पिता के घर जाने का विचार किया था तो मार्ग में लुम्बिनी नामक वनक्षेत्र में वे थकान के कारण विश्राम करने लगी थी और इसी दौरान उन्हें प्रसव -पीड़ा होने लगी तो उसी स्थान के निकट स्थित एक कुँए से जल निकलवाकर स्नान करके प्रसवपीड़ा को किंचित शान्त करने का प्रयास उन्होंने किया था। स्नान के पश्चात वे थोड़ी ही दूर चल पायी थी कि उन्हें जोर से प्रसवपीड़ा होने लगी तब उन्हें उसी वनक्षेत्र में स्थित एक सालवृक्ष का सहारा लेकर बैठना पड  गया और थोड़ी देर बाद वहीं पर सिद्धार्थ को जन्म दिया था । इनके साथ में चल रहे दो नाग राजाओं ने बालक सिद्धार्थ को भी उसी कुँए में स्नान करवाया।  बौद्धधर्म के अनुयायी आज भी इस कुँए को अत्यधिक पवित्र मानते हैं और उस कुँए से जल हराधन करके उसका पान करते हैं। 

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