बोधगया बिहार प्रान्त में स्थित बौद्ध धर्म का एक विशिष्ट केंद्र माना जाता है। महात्मा बुद्ध को बोधगया में ही एक पीपल के वृक्ष के नीचे सम्बोधि प्राप्त हुई थी तथा इसके बाद इसे बोधिवृक्ष-स्थल के रूप में जाना जाने लगा था। सम्राट अशोक के पुत्र एवम पुत्री ने इस बोधिवृक्ष की एक शाखा श्रीलंका की तत्कालीन राजधानी अनुराधपुर में लगवाई थी जो आज भी राजकीय संरक्षण में वहां पर मौजूद बताया जाता है। सम्राट अशोक ने यहां पर यात्रियों के लिए विहार तथा यात्री निवास का निर्माण करवाया था। सिद्धार्थ को इस स्थल पर बोध प्राप्त हो जाने बाद इसका महत्व बढ़ गया इसीलिए इसका नाम भी बोधगया पड़ गया। यहां पर स्थित बोधि वृक्ष की जड़ों से निकल हुआ नवीन वृक्ष आज भी दर्शनीय है।
भौगोलिक स्थिति :-
यह स्थल बिहार प्रान्त के गया जनपद में गया से १६ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। भारत का प्रसिद्ध पर्यटन केंद्र एवम बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र होने के नाते यह भारत के सभी प्रमुख नगरों से रेलमार्ग एवम सड़कमार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है।यहां का निकटतम हवाई अड्डा पटना है जो यहां से ११२ किलोमीटर की दूरी पर है। रेलमार्ग द्वारा निकटतम रेलवे स्टेशन गया यहां से १६ किलोमीटर दूरी पर स्थित है। सड़कमार्ग द्वारा यह रांची से २२ किलोमीटर दूर है। बिहार टूरिज्म डेवलेपमेंट का० द्वारा बोधगया से अन्य नगरों हेतु डीलक्स बसें चलाई जाती हैं। यहां पर बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम द्वारा संचालित अतिथिगृह उपलब्ध हैं जिसमे अतिथियों के ठहरने एवम भोजन की उचित व्यवस्था की जाती है।
ऐतिहासिक साक्ष्य :-
प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान एवम ह्वेनसांग के यात्रा विवरण से ज्ञात होता है की उनके आगमनकाल के समय यह नगर उजड़ चूका था क्योंकि जिस स्थान पर बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी वहां पर उन्होंने केवल तीन मठ ही बने हुए देखे थे। इस मठ में रहने वाले भिक्षुओं के आचार सम्बन्धी नियम अत्यधिक कठोर बताया है। सम्राट अशोक ने सर्वप्रथम यहां पर एक मन्दिर बनवाया था जिसका वास्तविक स्थान तो ज्ञात नहीं है किन्तु यहां से प्राप्त शिलालेखों से यह जानकारी मिलती है कि बोधगया का सर्वाधिक महत्वपूर्ण मन्दिर महाबोधि मन्दिर था।इस मन्दिर के शिलालेखों में यह अंकित है कि श्रीलंका,चीन,म्यांमार ,जैसे देशों से सातवीं एवम दसवीं शताब्दी में पर्यटक यहां पर आया करते थे। चीनी यात्री फाह्यान एवम ह्वेनसांग जो क्रमशः ४०९ ई एवम ६३७ ई में बोधगया आया था के यात्रा वर्णन से इसकी पुष्टि होती है।
महाबोधि मन्दिर :-
सम्राट अशोक ने सर्वप्रथम यहां पर एक मन्दिर बनवाया था जिसके स्थान व चिह्न तो अब भी मौजूद हैं किन्तु मन्दिर के आकर प्रकार का कोई प्रामाणिक तथ्य अथवा उसके अवशेष दृष्टिगत नहीं हैं। बोधगया का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्मारक महाबोधि मन्दिर है जो वास्तुशिल्प का अनुपम एवम अद्वितीय उदाहरण है। यह मन्दिर लगभग १३०० वर्ष पूर्व बनवाया गया बताया जाता है। इस मन्दिर की ऊँचाई १७० फिट और इसके चारों कोनो पर चार शिखर बनवाये गए थे जिसके कारण इसकी बहरी भव्यता में श्रीवृद्धि होता प्रतीत होता है। इसके परिसर में अनेकों स्तूप बने हुए हैं और मन्दिर का प्रवेशद्वार बहुत ही आकर्षक एवम भव्य लगता है। मन्दिर के गर्भगृह मेंभगवान बुद्ध की प्रतिमा स्थापित है। बोधि वृक्ष के नीचे निर्मित चबूतरे को वज्रासन की संज्ञा दी जाती है।
अन्य दर्शनीय स्थल :-
इसके अतिरिक्त सन १९३८ ई में यहां पर तिब्बती मन्दिर का निर्माण हुआ था और सन १९४५ ई में चीनी मन्दिर एवम बौद्ध विहार का निर्माण हुआ था। वर्मा एवम थाईलैंड के बौद्ध धर्म के अनुयायियों ने भी यहां पर बौद्ध मन्दिर का निर्माण करवाया है। इसके अतिरिक्त सुजाता स्थल,दुर्गेश्वरी मन्दिर ,अनिमेषलोचन ,पुरातत्व संग्रहालय ,भूटान व लंका के बौद्ध मठ आदि भी यहां दर्शनीय स्थलों में माँने जाते है।
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