Thursday, August 11, 2016

वैशाली

वैशाली बुद्धकाल में लिच्छवियों का प्रसिद्ध गणराज्य एवम उनकी राजधानी थी। यहां पर लिच्छवियों ने महात्मा बुद्ध के ठहरने के लिए महावन में कूटागारशाला का निर्माण करवाया था। इस कुटागारशाला में महात्मा बुद्ध भिक्षुओं को उपदेश दिया करते थे। इस नगर की प्रसिद्ध वधू आम्रपाली भगवान बुद्ध से दीक्षा ग्रहण कर उनका शिष्यत्व ग्रहण किया था और उसने भिक्षु संघ के लिए आम्रवाटिका को दान में उन्हें दे दिया था। वैशाली भगवान महावीर की जन्मस्थली के रूप में भी जानी जाती है।
भौगोलिक स्थिति :-
यह भारतवर्ष के बिहार प्रान्त में वैशाली जनपद के अन्तर्गत एक गांव में स्थित है। यह गांव १२ अक्टूबर १९७२ ई को मुजफ्फरपुर से अलग होकर वैशाली जनपद में सम्मिलित हुआ था जिसका मुख्यालय हाजीपुर है। भगवान बुद्ध के समय में सोलह महाजनपदों में वैशाली का स्थान मगध के समतुल्य था। तत्कालीन वैशाली का विस्तार ऊतरप्रदेश के देवरिया एवम कुशीनगर से लेकर बिहार के गाजीपुर तक था। भौगोलिक दृष्टि से यह मैदानी क्षेत्र है और इस क्षेत्र में अनेकों नदियां भी प्रवाहित होती हैं। 
ऐतिहासिक साक्ष्य :-
ऐतिहासिक दृष्टि से वैशाली को विश्व में सबसे बड़ा गणतन्त्र होने का गौरव प्राप्त है। वैशाली का नामकरण महाभारत काल के  इक्ष्वाकु वंश के राजा विशाल के नाम पर किया गया बताया जाता है। विष्णुपुराण में भी इसका उल्लेख मिलता है। यहां के राजा सुमति अयोध्या के महाराजा दशरथ के समकालीन थे। ईशा पूर्व सातवीं शताब्दी  शासक जनता के द्वारा चुना जाता था। इसीलिए इसे विश्व का प्रथम गणराज्य की संज्ञा दी जाती है। अन्य दर्शनीय स्थल :-
वैशाली बिहार का एक प्राचीन सम्पन्न नगर था जिसके खण्डहर आज भी गण्डक नदी के बाँये किनारे पर देखे जा सकते हैं। भगवान बुद्ध अपने बुद्धत्व प्राप्ति के पश्चात यहीं पर धर्मोपदेश के लिए प्रथम बार पधारे थे। प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान ने अपने यात्रा- विवरण में इंगित किया है कि इस नगर के उत्तर में एक बहुत बड़ा जंगल था और इसी जंगल में दो मंजिला एक विहार स्थित था। इस विहार में बुद्ध प्रायः रुकते थे। वैशाली के निकट उसने तीन अन्य स्तूपों के स्थित होने का भी वर्णन किया है। एक स्तूप वहां पर स्थित है जहां बुद्ध ने अंतिम बार यात्रा की थी और दूसरा इस नगर के उत्तरी पश्चिमी भाग में और तीसरा जहां बुद्ध ने संघ के संचालन हेतु अनुशासन एवम तत्सम्बन्धी नियमों का विनिश्चय किया था। ह्वेनसांग ने अपने यात्रा- वर्णन में लिखा है कि यह नगर तब उजड़ चूका था किन्तु उसने एक ऐसे स्तूप का वर्णन किया था जिसमें आनन्द भिक्षु की अस्थियां गाड़ी गयीं थीं। यहां सारिपुत्र के संरक्षण में भी एक एक स्तूप बनवाये जाने का उल्लेख हुआ है। सम्राट अशोक के शासनकाल में यहां एक सरोवर के निर्माण कराये जाने का उल्लेख भी मिलता है। इसी सरोवर के निकट ५० फिट ऊंचा एक स्तम्भ भी निर्मित था। ह्वेनसांग ने वैशाली की  द्वितीय संगीत सम्मेलन का वर्णन भी किया है। वैशाली की नगरवधू आम्रपाली आचार्य चतुरसेन द्वारा रचित ग्रन्थ है जिसपर फिल्म भी बनायी जा चुकी है। 
बौद्ध तथा जैन धर्म के अनुयायिओं के अतिरिक्त यहां पर सामान्य पर्यटक भी आते रहते हैं क्योंकि यह प्राचीनकाल से ही कला, साहित्य एवम संगीत की दृष्टि से भी अत्यन्त समृद्ध रही है। महात्मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात वैशाली में दुसरे बौद्ध परिषद् का आयोजन किया गया था और इस आयोजन की स्मृति में दो बौद्ध स्तूप बनवाये गए थे। वैशाली के सन्निकट ही एक विशाल बौद्ध मठ स्थित है जिसमें महात्मा बुद्ध उपदेश दिया करते थे।  वैशाली नगर अत्यन्त समृद्ध एवम सुरक्षित नगर था क्योंकि इसकी चाहरदीवारी में समनान्तर तीन दीवारें बनवाई गयीं थीं। बताया जाता है कि यह नगर तब १४ मील में फैला हुआ था।         

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